कांगड़ा की यात्रा ने ‘कोमल’ कर दिये मौला राम के ‘रंग’, पहाड़ी चित्रकला की गढ़वाल शैली के जनक की प्रेरककथा

कांगड़ा की यात्रा ने ‘कोमल’ कर दिये मौला राम के ‘रंग’, पहाड़ी चित्रकला की गढ़वाल शैली के जनक की प्रेरककथा
कांगड़ा की यात्रा ने ‘कोमल’ कर दिये मौला राम के ‘रंग’, पहाड़ी चित्रकला की गढ़वाल शैली के जनक की प्रेरककथा
विनोद भावुक। कांगड़ा
हिमालयी चित्रकला परंपरा की बात हो और मौला राम का ज़िक्र न आए ऐसा मुमकिन नहीं। गढ़वाल स्कूल ऑफ मिनिएचर पेंटिंग के जनक, कवि, इतिहासकार और कूटनीतिज्ञ मौला राम का जीवन केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहा। कम ही लोग जानते हैं कि उनकी कलायात्रा और वैचारिक दुनिया का कांगड़ा और सिरमौर से भी गहरा रिश्ता रहा।
इतिहास बताता है कि मुग़ल दरबार के चित्रकार शाम दास और उनके पुत्र हर दास (केहर दास) 1658 में दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह के साथ शरण लेकर गढ़वाल पहुंचे। यहीं से चित्रकला की गढ़वाल शैली की नींव पड़ी और मौला राम (1743–1833) इसी परंपरा के वंशज बने। मौला राम की तूलिका पर मुग़ल शैली का प्रभाव दिखता है, लेकिन कांगड़ा की यात्रा के बाद उनकी शैली में निर्णायक मोड़ आया।
गढ़वाली चित्रकला में कांगड़ा के रंग
कला–इतिहासकारों के अनुसार, कांगड़ा यात्रा के बाद मौला राम की चित्रभाषा में बड़ा परिवर्तन दिखता है। पहले उनके चित्रों में मुग़ल दरबारी कठोरता थी। बाद में उनकी पेंटिंग्स में कोमल रेखाएं, भावनात्मक अभिव्यक्ति और प्रकृति से संवाद उभरता है, जो कांगड़ा शैली की पहचान है।उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ जैसे ‘वसकसज्जा नायिका’ इसी परिवर्तन का प्रमाण हैं।
मौला राम उन हिमालयी कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने चित्र, कविता और इतिहास तीनों से अपने समय को दर्ज किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि कांगड़ा ने मौला राम को गढ़वाली चित्रकला का वास्तविक स्वरूप गढ़ने में प्रेरित किया। मौला राम की यह प्रेरक कहानी यह सिखाती है कि कला सीमाओं में नहीं बंधती।
दुनिया में संरक्षित कलाकृतियां
मौला राम की कला–परंपरा उनके पुत्र ज्वाला राम और पौत्र आत्मा राम ने आगे बढ़ाई। बाद की पीढ़ियों में डर और ‘श्राप’ की लोकधारणाओं के कारण कुछ ने चित्रकला छोड़ दी, लेकिन उनके वंशज तुलसी राम ने देहरादून के गुरु राम राय दरबार की भित्ति–चित्र परंपरा को अमर कर दिया। कांगड़ा की कोमलता, सिरमौर की सियासत और गढ़वाल की आत्मा, तीनों मिलकर मौला राम की तूलिका में उतरते हैं।
मौला राम की पेंटिंग्स आज हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय संग्रहालय, श्रीनगर, भारत कला भवन, वाराणसी कस्तूरभाई लालभाई संग्रहालय, अहमदाबाद, बोस्टन म्यूज़ियम अमेरिका में संग्रहित की गई हैं। उनकी कृतियां बताती हैं कि हिमालय केवल पर्वत नहीं, एक जीवंत कला–संस्कृति है और कला–संस्कृति के प्रचार- प्रसार में मौला राम की भूमिका एक नायक की है।
इतिहास रचा, भविष्य देखा
मौला राम केवल चित्रकार नहीं थे, वे सक्रिय राजनीतिक साक्षी और भागीदार भी थे। गढ़वाल के राजा जयाकृत शाह के समय विद्रोह को दबाने के लिए सिरमौर रियासत के राजा जगत प्रकाश से सहायता लेने में मौला राम की भूमिका दर्ज है। यह वही दौर था जब हिमालयी रियासतें गढ़वाल, कांगड़ा और सिरमौर राजनीति, युद्ध और सांस्कृतिक आदान–प्रदान के साझा मैदान थे।
मौला राम ने केवल चित्र नहीं बनाए, उन्होंने इतिहास भी लिखा। उनकी कृति ‘गढ़राजवंश का इतिहास’ आज गढ़वाल के राजवंशों पर सबसे विश्वसनीय स्रोतों में गिनी जाती है। इसमें उन्होंने गढ़वाल के राजाओं, गोरखा शासन की कठोरता, और अंग्रेज़ी प्रभुत्व के उदय को प्रत्यक्षदर्शी की तरह दर्ज किया। उनकी रचनाओं में गोरखा शासन के पतन की भविष्यवाणी बाद में सच साबित हुई।
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Jyoti maurya

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