अमृतसर की फुलन रानी, कांगड़ा में रह कर बनाईं 150 वॉटरकलर पेंटिंग, लैंडस्केप में उतार दिये नदियां, झरने और पर्वत, दो राष्ट्रपतियों के हाथों सम्मान

अमृतसर की फुलन रानी, कांगड़ा में रह कर बनाईं 150 वॉटरकलर पेंटिंग, लैंडस्केप में उतार दिये नदियां, झरने और पर्वत, दो राष्ट्रपतियों के हाथों सम्मान
अमृतसर की फुलन रानी, कांगड़ा में रह कर बनाईं 150 वॉटरकलर पेंटिंग, लैंडस्केप में उतार दिये नदियां, झरने और पर्वत, दो राष्ट्रपतियों के हाथों सम्मान
विनोद भावुक। धर्मशाला
अमृतसर की सुप्रसिद्ध चित्रकार फुलन रानी ने भारतीय कला जगत में अपनी अनूठी पहचान बनाई। 1928 में जन्मीं फुलन रानी ने बिना किसी औपचारिक कला प्रशिक्षण के भी अपनी रचनात्मकता से देश और विदेश में नाम कमाया। साल 1955 का उनका कांगड़ा वैली का अनुभव और चित्रकार शोभा सिंह से मुलाक़ात उनकी कला में एक नया मोड़ साबित हुआ।
1955 में फुलन रानी कांगड़ा वैली पहुंचीं और वहां के हरियाली भरे खेत, तेज बहती नदियाँ, शानदार झरने और नीले पर्वतों की अनंत श्रृंखलाएं देख उनकी कला में एक नया रंग भर गया। इस प्राकृतिक सौंदर्य ने उन्हें लैंडस्केप पेंटिंग की ओर अग्रसर किया। उन्होंने कांगड़ा की लगातार बदलती रौनक और रंगों को अपने वॉटरकलर में उतारा।
प्रकृति और फूलों प्यार के रंग
अगले पांच वर्षों में फुलन रानी ने सैंकड़ों लैंडस्केप पेंटिंग बनाई। उनकी कांगड़ा पेंटिंग्स में ‘वाटरफाल एट भवारना’, ‘मच्छयाल कुंड इन द इवनिंग’, ‘नोरह रिचर्ड कॉटेज’और सनसेट एट ततेहाल’ प्रमुख हैं। इन पेंटिंग्स में प्राकृतिक दृश्यों के सौंदर्य, रोमांटिक भाव और भावनात्मक गहराई को वॉटरकलर तकनीक के माध्यम से अद्वितीय ढंग से प्रस्तुत किया गया।
कांगड़ा की घाटियों ने फुलन रानी को प्रकृति और फूलों के प्रति प्रेम भी विकसित किया। उनके फूलों के अध्ययन ने ब्रिटिश कला प्रेमियों का भी ध्यान आकर्षित किया। उनके ‘ए वाइल्ड रोज बुश’ और ‘फ्लावर्स इन कोंच शैल’ जैसे चित्र केवल फूल नहीं दिखाते, बल्कि उनकी प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि को भी प्रकट करते हैं।
कांगड़ा पर आधारित पेंटिंग की प्रदर्शनी
1948 में शिमला फाइन आर्ट प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग, ‘द डांसर’ को पहला पुरस्कार मिला। 1953 में अमृतसर में आयोजित सिल्वर जुबली फाइन आर्ट प्रदर्शनी में उनकी पेंटिंग ट्विन सिस्टर्स दडे एंड नाइट’ के लिए राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के हाथों गोल्ड मेडल मिला। उनकी कला में सौंदर्य की समझ, भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि झलकती है।
1960-65 के बीच उन्होंने कांगड़ा पर आधारित 150 पेंटिंग की प्रदर्शनी पुणे, मुंबई और कोलकाता में आयोजित की। 1969 में गुरु नानक देव जी की ‘पिकटोरियल बायोग्राफी’ लिखने के लिए राष्ट्रपति वीवी गिरी ने सम्मानित किया। आज भी उनकी कांगड़ा पेंटिंग्स भारतीय कला के इतिहास में एक प्रेरक योगदान मानी जाती हैं।
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Jyoti maurya

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