जर्मन का हसबैंड, सूरीनाम की वाइफ, 50 साल लाहौल की वादियों में गुजारी लाइफ
जर्मन का हसबैंड, सूरीनाम की वाइफ, 50 साल लाहौल की वादियों में गुजारी लाइफ
विनोद भावुक। केलंग
एक ऐसा स्थान जहां तब न सड़कें थीं, न आधुनिक सुविधाएं। एक यूरोपीय दंपति लाहौल की दुर्गम घाटियों में, सीमित संसाधनों के बीच, नई भाषा और संस्कृति के साथ जीवन की शुरुआत कर रहा था। लाहौल की मिट्टी से यह दंपति इतना रच- बस गया कि जीवन की आधी सदी यहीं गुजार दी। जर्मन मिशनरी, भाषाविद् और वनस्पति संग्राहक ऑगस्ट विल्हेम हेयडे और उनकी पत्नी मारिया हेयडे का लाहौल घाटी का पचास साल का सफर किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं है।
केलंग से दाम्पत्य जीवन की शुरुआत
1825 में जर्मनी के हेरनहुट में जन्मे विल्हेम हाइड (बाद में ऑगस्ट विल्हेम हेयडे) प्लंबर के रूप में काम करते थे। वे मोरवियन चर्च से जुडने के बाद उन्हें 1853 में एशिया मिशन के लिए भेज दिया गया। तिब्बत में प्रवेश की अनुमति न मिलने पर उन्होंने लद्दाख के लेह में मिशन स्थापित किया और बाद में लाहौल का केलंग उनका स्थायी केंद्र बना। 1859 में शादी के बाद सूरीनाम निवासी उनकी पत्नी मारिया हेयडे भी केलंग पहुंच गई।
भाषा के लिए काम, वनस्पति की संभाल
19वीं सदी का केलंग आज की तरह सुविधाजनक नहीं था। न सड़कें थी, न आधुनिक चिकित्सा और न ही संचार के साधन थे। ऐसे दुर्गम स्थान में हेयडे दंपति ने जीवन के लगभग 50 साल स्थानीय समुदायों के बीच रहकर काम किया। तिब्बती और अन्य स्थानीय पहाड़ी भाषाएं सीखकर धार्मिक और सामाजिक सेवा करते हुए उनकी पत्नी ने भी शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेयडे ने हिमालयी पौधों और प्राकृतिक नमूनों का संग्रह किया। उनकी एकत्रित की गई हिमालयी वनस्पतियाँ आज भी एडिनबर्ग और बर्लिन के वनस्पति संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
हिमालयी भाषाओं का प्रारंभिक वैज्ञानिक अध्ययन
उन्होंने तिब्बती भाषा के अध्ययन में योगदान दिया। प्रसिद्ध विद्वान हेनरिच ऑगस्ट जसके के साथ सहयोग किया। उन्होंने तिब्बती न्यू टेस्टामेंट के अनुवाद में भागीदारी की और और लिंगुइस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के लिए स्थानीय बोलियों और लोक संस्कृति का दस्तावेजीकरण किया। उनका यह कार्य हिमालयी भाषाओं के प्रारंभिक वैज्ञानिक अध्ययन का आधार बना। तिब्बती भाषाशास्त्र में शुरुआती योगदान, वैज्ञानिक और वनस्पति अनुसंधान लाहौल को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
सूरीनाम से केलंग तक मारिया
19 अप्रैल 1837 को परमरीबो (सूरीनाम) में जन्मी मारिया एलिज़ाबेथ हार्टमैन एक मिशनरी परिवार से थीं। 22 वर्ष की आयु में उन्होंने मिशनरी ऑगस्ट विल्हेम हेयडे से विवाह किया और 1859 में केलंग पहुंची। मारिया ने तिब्बती भाषा सीखकर उसमें लिखना-पढ़ना शुरू किया। स्थानीय लड़कियों के लिए बुनाई और सिलाई स्कूल खोला। अपनी डायरी में लाहौल की कृषि पद्धतियों, रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन का विस्तार से वर्णन किया। उनकी डायरी आज हिमालयी समाज के 19वीं सदी के जीवन का अमूल्य दस्तावेज़ मानी जाती है।
भाषा और अनुवाद में योगदान
मारिया हेयडे ने तिब्बती भाषा में महारत हासिल की और बाइबिल के ‘मूसा’ की दो पुस्तकों का अनुवाद किया। यह कार्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भाषाई और सांस्कृतिक सेतु का उदाहरण था। केलंग में ही उन्होंने अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। हालांकि चार बच्चों की मौत ने उन्हें गहरा आघात दिया, फिर भी एक विदेशी महिला ने हिमालय में साहसी जीवन जिया। शिक्षा और महिला सशक्तिकरण का प्रारंभिक प्रयास किया, तिब्बती भाषा और संस्कृति का दस्तावेजीकरण किया जो लाहौल के सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।
किताब से सामने आई कहानी
लगभग 1898 के आसपास हेयडे और उनकी पत्नी जर्मनी लौटे। 1907 में हेयडे का निधन हुआ। 6 अप्रैल 1917 को मारिया भी स्वर्ग सिधार गईं। 1920 में प्रकाशित ऑगस्ट विल्हेम हेयडे की जीवनी “Fünfzig Jahre unter Tibetern” ने उनकी जीवनगाथा दुनिया तक पहुंचाई। हेयडे दंपति की कहानी बताती है कि सीमाएं केवल नक्शों पर होती हैं। साहस, जिज्ञासा और समर्पण से कोई भी व्यक्ति दूरस्थ स्थान को अपना घर बना सकता है। लाहौल की बर्फीली घाटियां आज भी उनकी 50 साल की तपस्या की साक्षी हैं। यह कहानी एक मिशनरी दंपति की नहीं, साहस, अनुकूलन और सांस्कृतिक संवाद की है।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/untold-story-sita-of-shimlas-ramlila-and-the-maha-khalnayak-of-mumbais-bollywood/
