गर ड्राइवर पिता ने न की होती पहचान, तो पदमश्री तक न पहुंचती बेटे के हुनर की उड़ान

गर ड्राइवर पिता ने न की होती पहचान, तो पदमश्री तक न पहुंचती बेटे के हुनर की उड़ान
अगर ड्राइवर पिता ने न की होती पहचान, तो पदमश्री तक न पहुंचती बेटे के हुनर की उड़ान
विनोद भावुक। चंबा
1970 के दशक की बात है। चंबा शहर से संबंध रखने वाले हिमाचल पथ परिवहन निगम के एक ड्राइवर अपने छोटे से बेटे स्कूल जाना भी शुरू नहीं किया था, को अक्सर अपनी बस में रूट पर अपने साथ ले जाते। घर लौट कर बेटा बस के रूट बोर्ड पर लिखी जगहों के नाम कागज पर उतारने लगता। पिता की नज़र बेटे की कला पर पड़ी तो प्रोत्साहन की सोची।
एक साधारण सा ड्राइवर बेटे का हाथ थामकर सीधे चंबा के भूरी सिंह संग्रहालय पहुंचा। क्यूरेटर से मिलकर बेटे की कला के बारे में बताया और सिखाने का अनुरोध किया। यही वह पल था जिसने नन्हें से बच्चे की जिंदगी की दिशा बदल दी। भूरी सिंह संग्रहालय ने एक ऐसा चित्रकार तराशा जो कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग का नया जनक बन गया।
15 साल की उम्र में बनारस की सीख
यह प्रेरक कहानी है साल 2012 में पदमश्री से सम्मानित चंबा के चित्रकार विजय शर्मा की, जिन्होंने लुप्त होती पहाड़ी लघु चित्रकला को पुनर्जीवित किया है और चित्रकारों की नई नस्ल तैयार की है। विजय शर्मा एक चित्रकार नहीं, संस्थान हैं। उन्होंने एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं और सुर और ताल के भी बड़े जानकार हैं। उनकी कला की उड़ान प्रेरक है।
परिजनों ने बेटे के हुनर को समझा व प्रोत्साहन दिया। भूरी सिंह संग्रहालय, बनारस कला भवन तथा उस्ताद शारदा प्रसाद ने उनकी प्रतिभा को संवारा। वे 15 साल की उम्र में लघु चित्रकला की बारीकियां सीखने बनारस पहुंच गए। एक सप्ताह के बनवास प्रवास का अनुभव जादू से कम नहीं था। रंगों की दुनिया, चित्रों की गहराई और कलाकारों का जुनून उनके मन में बस गया।
पेंटर की नौकरी शुरुआत, जिद से बदले हालत
18 साल की उम्र में कला के हुनर के चलते विजय शर्मा को एचआरटीसी में पेंटर की नौकरी मिल गई। बसों पर रूट लिखना, पेंट करना उनका काम था। उनके पास नौकरी की सुरक्षा थी, लेकिन दो साल के भीतर मोह भंग हो गया। उन्हें लगा कि वे किसी बड़े मकसद के लिए बने हैं, यही सोचकर नौकरी छोड़ दी।
उनकी किस्मत ने साथ दिया और वह भाषा एवं संस्कृति विभाग में संरक्षण सहायक के पद पर चयनित हो गए। कुछ समय बाद 1988 में यह नौकरी भी छोड़ दी और चंबा संग्रहालय से एक कलाकार के रूप में जुड़ गए। विजय शर्मा ने ठान लिया कि वह लघु चित्रकला को पुनर्जीवित करेंगे। अपनी जिद से उन्होंने इतिहास लिख डाला।
चित्रकला जिनके लिए है जुनून
विजय शर्मा ने कई युवाओं को प्रशिक्षित किया है। उनके पास आज भी कई नवोदित चित्रकार इस कला को सीखने आते हैं। चित्रकला को लेकर उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। चित्रकला उनके लिए जुनून हैं। उन्होंने अपने घर में एक छोटा सा पुस्तकालय व चित्रकक्ष बना रखा है, जहां सभी एक साथ बैठकर रंगों में डूब जाते हैं।
युवा प्रतिभाओं को तराशने और इस महान कला के मिटते रंगों में फिर से जान डालने वाले
विजय शर्मा को मलाल यह है कि आज के दौर में पैसा तो बहुत है, लेकिन कला की सच्ची सराहना गायब होती जा रही है। कलाकारों को सम्मान और पहचान की जरूरत होती है। कला को चमकने के लिए संरक्षण चाहिए होता है।
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Jyoti maurya

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