नग्गर को दुनिया की ‘सिटी ऑफ नॉलेज’ बनाने का सपना बुनने वाली सेंट पीटर्सबर्ग की हेलीना, बीसवीं सदी की महान दार्शनिक, लेखिका और विचारक की प्रेरककथा
नग्गर को दुनिया की ‘सिटी ऑफ नॉलेज’ बनाने का सपना बुनने वाली सेंट पीटर्सबर्ग की हेलीना, बीसवीं सदी की महान दार्शनिक, लेखिका और विचारक की प्रेरककथा
विनोद भावुक। नग्गर (कुल्लू)
कुल्लू घाटी दुनिया की सिटी ऑफ नॉलेज बने, इसी सपने को लेकर बीसवीं सदी की महान दार्शनिक, लेखिका और विचारक हेलीना इवानोव्ना रोरिख रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से कुल्लू घाटी के ऐतिहासिक कस्बे नग्गर में आईं थी। चित्रकार और दार्शनिक निकोलस रोरिख की पत्नी हेलीना एक उच्चकोटि की दार्शनिक, अनुवादक और अग्नि योग दर्शन की प्रमुख प्रवर्तक थीं।
अपने पति के साथ उन्होंने 1920 के दशक में मध्य एशिया, तिब्बत, मंगोलिया और हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों की ऐतिहासिक यात्राएँ कीं और 1928 में इस दंपती ने कुल्लू घाटी में उरुस्वती हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। रवीन्द्रनाथ टैगोर, जे.सी. बोस, अल्बर्ट आइंस्टीन, मिलिकन जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिक और विचारक इस संस्थान में शामिल रहे।
उरुस्वती की ऑनरेरी फाउंडर प्रेज़ीडेन्ट
12 फरवरी 1879 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में जन्मी हेलीना रोरिख का सबसे सृजनात्मक पड़ाव कुल्लू घाटी का नग्गर बना। नग्गर के पास स्थापित उरुस्वती संस्थान केवल शोध केंद्र नहीं था, बल्कि एक ऐसा प्रयोग था जहां पूर्व और पश्चिम के दर्शन का संगम हुआ, मानव चेतना, संस्कृति, कला और विज्ञान पर शोध हुआ। यहां बौद्ध, वैदिक और तांत्रिक परंपराओं का गहन अध्ययन किया गया।
हेलीना रोरिख इस संस्थान की ऑनरेरी फाउंडर प्रेज़ीडेन्ट रहीं। वे संस्थान में होने वाले शोध की बौद्धिक दिशा तय करती थीं। नग्गर में रहते हुए हेलीना रोरिख ने अग्नि योग की प्रमुख कृतियां लिखीं, ‘फाउंडेशन ऑफ बुद्धिज़्म’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक तैयार की और ब्लावात्स्की की मशहूर रचना ‘द सेक्रेट डोकट्रीन’ का रूसी अनुवाद किया।
चेतना का मौन साक्षी नग्गर
हेलीना रोरिख का सपना था कि कुल्लू घाटी एक वैश्विक ‘ज्ञान का नगर बने। इस घाटी से उन्होंने सैकड़ों पत्र लिखे, जिनमें जीवन, ब्रह्मांड, कर्म और संस्कृति की व्याख्या की नग्गर और कुल्लू की जलवायु, एकांत और प्रकृति ने हेलीना रोरिख के दर्शन को आकार दिया। उन्होंने नग्गर को प्रयोगशाला की तरह जिया, जहां मानव आत्मा और ब्रह्मांड के नियमों पर काम हुआ।
हेलीना रोरिख का देहांत 5 अक्टूबर 1955 को कालिम्पोंग में हुआ। उनकी कर्मभूमि नग्गर आज भी वैश्विक रोरिख अनुयायियों के लिए तीर्थ समान है। नग्गर का उरुस्वती संस्थान और रोरिख निवास
गवाही देते हैं कि कैसे रूस की दार्शनिक भारतीय साधिका बनीं। नग्गर उस चेतना का एक मौन साक्षी है, जहां महान दार्शनिक, लेखिका और विचारक हेलीना ने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लिखा।
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