डेरा बाबा वडभाग सिंह : 18वीं सदी के प्रमुख सिख धर्मगुरु वडभाग सिंह सोढ़ी की यादगार, देश भर में मशहूर होला मोहल्ला मेला
डेरा बाबा वडभाग सिंह : 18वीं सदी के प्रमुख सिख धर्मगुरु वडभाग सिंह सोढ़ी की यादगार, देश भर में मशहूर होला मोहल्ला मेला
विनोद भावुक। मैड़ी (ऊना)
हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले के मैड़ी गांव में स्थित डेरा बाबा वडभाग सिंह लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यह पावन स्थल 18वीं सदी के प्रमुख सिख धर्मगुरु वडभाग सिंह सोढ़ी की यादगार है, जिनका जीवन साहस, संघर्ष और धार्मिक नेतृत्व का प्रतीक रहा। फाल्गुन पूर्णिमा में यहां दस दिवसीय होला मोहल्ला मेला लगता है।
यहां आने वाले लोग मानते हैं कि यहां आकर नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है। भजन-कीर्तन, लंगर सेवा और पारंपरिक अनुष्ठान इस मेले को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं। उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
उथल-पुथल भरा दौर, कठोर निर्णयों का जन्म
1716 ईस्वी में पंजाब के जालंधर के निकट करतारपुर में जन्मे वडभाग सिंह, बाबा राम सिंह सोढ़ी और माता राज कौर के पुत्र थे। वे गुरु हरगोबिंद जी के वंशज और धीर मल की परंपरा से जुड़े थे। कम आयु में ही उन्होंने करतारपुर की धार्मिक गद्दी संभाली और सिख समाज में प्रभावशाली भूमिका निभाई, जब सिख पंथ राजनीतिक और सैन्य चुनौतियों से जूझ रहा था।
इतिहासकारों के अनुसार, यह दौर अत्यंत उथल-पुथल भरा था। केंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित जे एस ग्रेवाल अपनी पुस्तक, ‘द सिख्स ऑफ पंजाब’ में लिखते हैं कि प्रतिशोध की भावना ने कई कठोर निर्णयों को जन्म दिया। इतिहास के इन पन्नों में वीरता और विवाद, दोनों साथ चलते हैं और उस समय की जटिल परिस्थितियों को समझने का अवसर देते हैं।
सिख सेना ने दी अफगानों को मात
मार्च 1757 में अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमणों के दौरान करतारपुर पर हमला हुआ। ऐतिहासिक ‘थाम साहिब’ को जला दिया गया और अनेक निर्दोष नागरिक मारे गए। इस घटना ने वडभाग सिंह को झकझोर दिया। उन्होंने पंजाब के अंतिम मुगल सूबेदार अदीना बेग के साथ गठबंधन किया। सिख नेता जस्सा सिंह आहलुवालिया भी इस मोर्चे में शामिल हुए।
1757 के महिलपुर के युद्ध में सिख सेना ने अफगानों को कड़ी टक्कर दी। इस युद्ध में सिख सेना ने विजय हासिल की। यह संघर्ष केवल सैन्य जीत नहीं, बल्कि धार्मिक और सामाजिक स्वाभिमान की पुनर्स्थापना था। युद्ध के बाद जालंधर पर आक्रमण हुआ। वडभाग सिंह ने करतारपुर की तबाही का बदला लेने के लिए कठोर कदम उठाए।
नेतृत्व, साहस और आस्था का केंद्र
‘पंजाब : ए हिस्ट्री फ़्रोम ओरंगजेब टू माउंटबेटन’ में राज मोहन गांधी लिखते हैं कि वडभाग सिंह ने अफगानों से जीतने के बाद खुद को धार्मिक कार्यों की ओर मोड़ना शुरू कर दिया। युद्धों के बाद वडभाग सिंह मैड़ी गांव में रहने लगे। यही 31 दिसंबर 1761 को उनका देहावसान हुआ। आज वहीं स्थित डेरा बाबा वडभाग सिंह श्रद्धा का केंद्र है।
वडभाग सिंह सोढ़ी का जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी नेतृत्व, साहस और आस्था के बल पर समाज को संगठित किया जा सकता है। उनकी गाथा केवल युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि धार्मिक पहचान, सामाजिक एकजुटता और आध्यात्मिक शक्ति का संदेश भी है। मैड़ी गांव इसलिए आस्था का केंद्र है।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/the-inspiring-story-of-helena-of-st-petersburg-a-great-philosopher-writer-and-thinker-of-the-twentieth-century-who-dreamed-of-making-naggar-the-worlds-city-of-knowledge/
