कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग को दुनिया तक पहुंचाने वाला लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम का कीपर

कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग को दुनिया तक पहुंचाने वाला लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम का कीपर
कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग को दुनिया तक पहुंचाने वाला लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम का कीपर
विनोद भावुक। धर्मशाला
इस प्रेरक कहानी के नायक हैं विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम लंदन में भारतीय सेक्शन के कीपर डब्ल्यू जी आर्चर, जिन्होंने कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग को पश्चिमी दुनिया में पहचान दिलाई। ब्रिटिश कला इतिहासकार और आई.सी.एस अधिकारी आर्चर ने साल 1952 में ‘Kangra Painting’ पुस्तक लिखकर कांगड़ा पेंटिंग की खूबियों से दुनिया भर के कला प्रेमियों को परिचित करवाया।
आर्चर कहते थे कि कांगड़ा चित्र केवल रंग नहीं, बल्कि हिमालय की आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। कांगड़ा की पेंटिंग केवल कला नहीं, बल्कि सांस्कृतिक इतिहास का दर्पण है। आरचर ने इसे सिर्फ देखा नहीं, बल्कि इसकी बारीकियों और विशेषताओं को गहरे से समझा, उस पर शोध कर दिल से लिखा और जाम कर प्रचारित किया।
कांगड़ा पेंटिंग का खास नॉलेज
विलियम जॉर्ज आर्चर, जिनका जन्म 1 फरवरी 1907 को लंदन में हुआ। उन्होंने केंब्रिज विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ा और फिर स्कूल ऑफ ओरियंटल स्टडीज लंदन में हिंदी, भारतीय इतिहास और कानून का अध्ययन किया। पढ़ाई के दिनों से ही वे भारत को लेकर आकर्षित थे और 1931 में भारत की भारतीय सिविल सेवा में शामिल हुए।
आर्चर ने बिहार में जिला मजिस्ट्रेट, जनगणना अधीक्षक, नागा हिल्स में अतिरिक्त उप-कमीशनर जैसे विभिन्न पदों पर काम किया। भारत में रहते हुए उन्होंने स्थानीय संस्कृति, कला और काव्य में गहरी रुचि विकसित की। विशेषकर संताल जनजाति और कांगड़ा पेंटिंग पर उन्होंने गहन अध्ययन किया और इन पर उनका ज्ञान अद्वितीय था।
कला और शोध का अनूठा संगम
उन्होंने राजस्थान, बुंदी, कोटा और पंजाब की पहाड़ियों की पेंटिंग्स को भी विस्तार से प्रस्तुत किया। उनका दृष्टिकोण केवल कला का मूल्यांकन नहीं था, बल्कि इतिहास, संस्कृति और जीवन दर्शन को चित्रों में समझना था। कांगड़ा पेंटिंग, मुगल, राजपूत और हिमालय की सौंदर्यपूर्ण छवियों की कला को उन्होंने दुनिया के सामने रखा।
1950 और 60 के दशक में उन्होंने बीबीसी टेलीविजन के लिए मॉनीटर श्रृंखला में कला कार्यक्रम प्रस्तुत किए। भारतीय कलाकार अविनाश चंद्रा के काम को वे दुनिया के सामने लाए। उन्होंने भारतीय कला को सिर्फ संग्रहालय तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विदेशी दर्शकों तक पहुंचाया। उनकी किताबें और लेख आज भी कला इतिहास के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक हैं।
1949 से 59 तक वे विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम, भारतीय सेक्शन के कीपर रहे। 1948 में उन्हें ऑफिसर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर का खिताब मिला। 1968 से 76 तक वे पंजाब विश्वविद्यालय और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेटर रहे। 1978 में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने बर्टन मेमोरियल मेडल दिया। उनके शोध-पत्र ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/a-century-ago-hermann-franke-of-germany-uncovered-the-temples-inscriptions-and-historical-documents-of-lahaul/

Jyoti maurya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *