कांगड़ा पर सिखों की जीत के असली नायक थे खुशाल सिंह जमादार, महाराजा रणजीत सिंह के दरबार के ‘दरोग़ा-ए-देहरी’, मिली थी राजा की उपाधि
कांगड़ा पर सिखों की जीत के असली नायक थे खुशाल सिंह जमादार, महाराजा रणजीत सिंह के दरबार के ‘दरोग़ा-ए-देहरी’, मिली थी राजा की उपाधि
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। कांगड़ा
महाराजा रणजीत सिंह ने 19वीं सदी के शुरू में जब पहाड़ी रियासतों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना शुरू किया, उस समय कांगड़ा रियासत रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रियासत थी। तब खुशाल सिंह जमादार उनकी सेना के प्रमुख अधिकारियों में शामिल थे। सैन्य कुशलता और प्रशासनिक क्षमता से इस सेनानायक ने कांगड़ा की राजनीति और शक्ति-संतुलन को पूरी तरह से बदल दिया।
1828 में कांगड़ा अभियान के दौरान खुशाल सिंह जमादार की भूमिका निर्णायक रही। जो सदियों से शक्ति और स्वाभिमान का प्रतीक रहा कांगड़ा किला सिख साम्राज्य के अधीन आया और इससे क्षेत्र में स्थिरता स्थापित हुई। महाराजा रणजीत सिंह के राज में खुशाल सिंह जमादार को उनकी सैन्य कुशलता और प्रशासनिक क्षमता के कारण ‘राजा’ की उपाधि मिली।
बदली कांगड़ा के इतिहास की दिशा
कांगड़ा में उनकी सैन्य सफलता ने सिख साम्राज्य को पहाड़ी इलाकों में मजबूत आधार दिया। इससे न केवल राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हुआ, बल्कि व्यापार मार्गों और किलेबंदी को भी सुदृढ़ किया गया।
इतिहासकार मानते हैं कि इस अभियान के बाद कांगड़ा क्षेत्र में प्रशासनिक ढाँचा अधिक संगठित हुआ और सेना नायक खुशाल सिंह जमादार का कद भी बढ़ा।
खुशाल सिंह जमादार ने कश्मीर, मुल्तान, डेरा गाज़ी खान और पेशावर जैसे अभियानों में भाग लिया।
वे प्रशासन और सैन्य नेतृत्व दोनों में दक्ष थे। उनकी रणनीति से मिली कांगड़ा विजय ने सिख साम्राज्य को हिमालयी क्षेत्रों में मजबूत किया। उनके जीवान से सीखा जा सकता है कि परिश्रम, निष्ठा और रणनीति से साधारण व्यक्ति भी इतिहास की दिशा बदल सकता है।
‘दरोग़ा-ए-देहरी’ की ज़िम्मेदारी
1790 में मेरठ जिले के इकारी गांव में जन्मे खुशाल सिंह का मूल नाम खुशाल राम था। एक सामान्य परिवार से निकलकर वे लाहौर पहुँचे और 1807 में सिख खालसा सेना में शामिल हुए। अपनी योग्यता और निष्ठा से वे दरबार में ‘दरोग़ा-ए-देहरी’ बने। यह ऐसा पद था, जिसकी बिना उनकी अनुमति कोई भी महाराजा तक नहीं पहुंच सकता था।
खुशाल सिंह जमादार लगभग 15 वर्षों तक सिख दरबार के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में रहे। साल 1844 में लाहौर में उनका निधन हुआ। कहा जाता है कि उन्होंने मौत से पहले ही अपनी अधिकांश संपत्ति दान कर दी। उदार और धार्मिक स्वभाव वाले खुशाल सिंह जमादार की समाधि लाहौर में स्थित है, जो आज भी इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
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