संघर्ष में प्रेम, त्याग में सम्मान : जब क्रांति और दाम्पत्य चले साथ, क्रांतिकारी यशपाल और प्रकाशवती की अनोखी प्रेमगाथा

संघर्ष में प्रेम, त्याग में सम्मान : जब क्रांति और दाम्पत्य चले साथ, क्रांतिकारी यशपाल और प्रकाशवती की अनोखी प्रेमगाथा
संघर्ष में प्रेम, त्याग में सम्मान : जब क्रांति और दाम्पत्य चले साथ, क्रांतिकारी यशपाल और प्रकाशवती की अनोखी प्रेमगाथा
विनोद भावुक। धर्मशाला
क्या आप जानते हैं कि भारत की आज़ादी की लड़ाई के उफान के बीच एक ऐसा विवाह हुआ, जिसने पूरे देश को संदेश दिया कि स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ पुरुषों का नहीं, बल्कि दम्पतियों का भी साझा संकल्प है? यह कहानी है कांगड़ा की धरती से जुड़े क्रांतिकारी यशपाल और उनकी क्रांतिकारी साथी प्रकाशवाती की, जिन्होंने 7 अगस्त 1938 को बरेली जेल में विवाह कर इतिहास रच दिया था।
यशपाल जेल में कैद थे। इसी दौरान उनकी क्रांतिकारी साथी प्रकाशवती ने ब्रिटिश अदालत में आवेदन दिया, ‘मैं कैदी यशपाल से विवाह करना चाहती हूँ।‘मजिस्ट्रेट असमंजस में पड़ गया। जेल में शादी का कोई कानून ही नहीं था! लेकिन अंततः अनुमति मिली। 7 अगस्त 1938 को बरेली जेल में विवाह संपन्न हुआ। यह विवाह संदेश था कि क्रांति और दाम्पत्य साथ-साथ चल सकते हैं।
बेटे की पढ़ाई, मां का त्याग
यशपाल के पूर्वज ब्रिटिश पंजाब के कांगड़ा जिले के निवासी थे। उनके दादा गोठूराम भोरंज के समीप भराइयाँ दे टिक्कर में रहते थे। पिता लाला हीरालाल एक छोटी-सी दुकान चलाते थे। आर्थिक स्थिति साधारण थी, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा भरपूर थी। वे नादौन के पास भूंपल में बस गए, जहां 1903 में यशपाल का जन्म हुआ।
यशपाल की माँ प्रेमा देवी शिक्षित और जागरूक महिला थीं। उन्होंने बेटे की शिक्षा के लिए संघर्ष किया। पति से अलग होकर फिरोजपुर छावनी में टीचर की नौकरी करते हुये कांगड़ा के गुरुकुल से लेकर लाहौर के डी.ए.वी. स्कूल तक की बेटे की पढ़ाई में माँ का त्याग साफ झलकता है। 14 वर्ष की उम्र में यशपाल ने अछूतों के स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। आठ रुपये मासिक वेतन उनकी पहली कमाई थी।
वायसराय की ट्रेन के नीचे बम विस्फोट
1921 के असहयोग आंदोलन ने उनके भीतर की देशभक्ति को दिशा दी। नेशनल कॉलेज लाहौर में प्रवेश के बाद उनकी मुलाकात हुई महान क्रांतिकारियों भगत सिंह और सुखदेव से हुई और वे हिंदोस्तान सोशलिस्ट रिप्ल्ब्लिकन एसोशिएसन के सक्रिय सदस्य बने। लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज के बाद क्रांतिकारियों ने सांडर्स की हत्या की योजना बनाई, जिसके लिए आर्थिक संसाधन यशपाल ने जुटाये।
लाहौर में बम फैक्टरी स्थापित की गई। रासायनिक प्रयोगों से यशपाल का स्वास्थ्य बिगड़ गया, पर इरादे अडिग रहे। उन्होंने 23 दिसंबर 1929 को वायसराय की विशेष ट्रेन के नीचे बम विस्फोट गया। विस्फोट हुआ, लेकिन वायसराय बच गया। यशपाल ने सैन्य अधिकारी का वेश धारण किया हुआ था। पुलिस ने उन्हें पहचानने के बजाय सलामी दे दी और फिर वे फरार हो गए।
हथियार के बाद कलम से क्रांति
ब्रिटिश हुकूमत ने यशपाल के सिर पर तीन हजार रुपये का इनाम घोषित किया। विश्वासघात के कारण वे गिरफ्तार कर लिए गए और कैदी बनाकर उन्हें जेल भेज दिया। जेल में ही उनकी शादी हुई। यशपाल ने साबित किया कि क्रांति सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, त्याग और साझेदारी से भी होती है। संघर्ष में भी प्रेम संभव है और त्याग में भी सम्मान है।
जेल के जीवन ने यशपाल को बंदूक की जगह कलम से क्रांति के लिए प्रेरित किया। हिन्दी कहानीकार और उपन्यासकार के तौर पर उनके नाम की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई। उनके नाम 47 पुस्तकों का लेखन दर्ज है। इन सबके बीच, जेल से शुरू हुआ दो क्रांतिकारियों का दाम्पत्य भारतीय इतिहास में साहस और समर्पण की अनूठी मिसाल है।
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Jyoti maurya

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