शिमला के मशहूर उर्दू शायर डॉ. शबाब ललित, जिन पर रावलपिंडी की पॉपुलर मैगज़ीन में छपा विशेषांक
शिमला के मशहूर उर्दू शायर डॉ. शबाब ललित, जिन पर रावलपिंडी की पॉपुलर मैगज़ीन में छपा विशेषांक
विनोद भावुक। शिमला
शिमला की ठंडी हवाओं में जब देवदार झूमते हैं, तो लगता है जैसे कोई पुरानी ग़ज़ल सरगोशियां कर रही हो। इन्हीं सरगोशियों में एक शायर का नाम आज भी गूंजता है। वह शायर जिसकी कलम ने पहाड़ों की खामोशी को अल्फ़ाज़ दिए और जिसकी शायरी ने सरहदों को लांघ कर दिलों को जोड़ा। डॉ. शबाब ललित की आवाज़ आज भी शिमला के देवदारों के बीच गूंजती है।
रावलपिंडी (पाकिस्तान) से प्रकाशित लोकप्रिय उर्दू मैगज़ीन ‘चाहरसू’ ने जून 2013 में डॉ. शबाब ललित पर 58 पृष्ठों का विशेषांक प्रकाशित किया। यह महज़ एक साहित्यिक सम्मान नहीं था, बल्कि उस कलम की वैश्विक पहचान थी जो शिमला की गोद में बैठकर इंसानियत का पैग़ाम लिखती रही। जिंदगी के कड़े इम्तिहानों के बावजूद उनकी शायरी में उम्मीद की लौ कभी नहीं बुझी।
पंजाब यूनिवर्सिटी, उर्दू में गोल्ड मेडल
डॉ. शबाब ललित का असली नाम भगवान दास ललित था। उनका जन्म 3 अगस्त 1933 को खानगढ़, ज़िला मुज़फ़्फ़रगढ़ (अब पाकिस्तान) में हुआ। विभाजन की त्रासदी के बाद उनका परिवार भारत आया और लाहौर के बाद अंततः हिमाचल प्रदेश में बस गया। पहाड़ों की गोद ने उन्हें नया आसमान दिया, और उन्होंने उसी आसमान पर उर्दू का चांद टांक दिया।
पंजाब यूनिवर्सिटी से इतिहास और उर्दू में एम.ए. तथा उर्दू साहित्य में पीएच.डी. करने वाले शबाब ललित केवल शायर ही नहीं, एक विद्वान शोधकर्ता थे। उर्दू में गोल्ड मेडलिस्ट रहे इस शायर ने 1946 में लाहौर से लेखन की शुरुआत की थी। बाद में भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में फील्ड पब्लिसिटी ऑफिसर रहते हुए उनकी कलम कभी थकी नहीं।
बहती नदी की तरह रचना संसार
डॉ. शबाब ललित की रचनात्मक यात्रा किसी बहती नदी की तरह थी। बारह उर्दू काव्य-संग्रह, छह हिंदी कविता संग्रह, दो पहाड़ी काव्य-संग्रह और साहित्यिक आलोचना की तीन पुस्तकें। कुल मिलाकर सैंतीस से अधिक शीर्षक उनके नाम दर्ज हैं। ‘मिज़राब’, ‘पतवार’, ‘सहरा की प्यास’, ‘उड़ान’, ‘दायरों का सफ़र’, ‘समंदर प्यासा है’ पुस्तकें पुरस्कृत हुईं और उर्दू शायरी के नए मानक भी स्थापित करती रहीं।
ग़ज़लों के बारे में वह कहा करते थे कि उर्दू साहित्य में ग़ज़ल उर्दू शायरी की आबरू है। उर्दू का भविष्य ग़ज़ल पर ही निर्धारित है। उनकी ग़ज़लों में भारतीय संस्कृति के प्रतीक, मिथक और विविध धर्मों की पौराणिक कथाएं सहजता से उतर आती थीं। परंपरा और आधुनिकता का ऐसा संगम किसी शायर के कलाम में कम ही देखने को मिलता है।
किसी को याद, कहीं नजर अंदाज
डॉ. शबाब ललित की शायरी को उर्दू अदब की दुनिया में बड़ा फ़लक हासिल हुआ। उनको देश की कई संस्थाओं ने सम्मानित किया। हिमाचल रत्न, हिमाचल श्री, आबशार-ए-अदब सहित अनेक सम्मान मिले। उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेस मैसूर ने भी उनकी कृतियों को पुरस्कृत किया।
विडंबना देखिए कि जिस शायर को राष्ट्रीय साहित्य अकादमी से सम्मान मिलना चाहिए था, उन्हें राज्य स्तर पर भी अपेक्षित मान्यता नहीं मिल सकी। खुद शबाब साहब को इस बात का मलाल था कि प्रदेश में उर्दू लेखकों को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। वह कहा करते थे कि उर्दू भारत में पैदा हुई और पली-बढ़ी, इसे किसी एक धर्म की भाषा मान लेना नासमझी है।
उनको जानने वाले बताते हैं कि जीवन की साँझ में बीमारियों से जूझते हुए भी वह दूसरों की ग़ज़लें संपादित करते रहते थे। सैकड़ों युवा रचनाकार अपनी पंक्तियों को निखारने के लिए उनकी शरण में आते थे। उनकी निजी ज़िंदगी भी संघर्षों से भरी रही। विभाजन का दर्द, पहली पत्नी की असमय मृत्यु, जीवन की अनेक परीक्षाएं, लेकिन उनकी शायरी में उम्मीद की लौ कभी नहीं बुझी।
शिमला शहर ने उर्दू अदब को एक अनमोल नगीना दिया। वह सचमुच उस हीरे की तरह थे जिसकी चमक पहाड़ों की अपारदर्शिता को भी भेद गई। 7 फरवरी 2014 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, मगर उनकी आवाज़ अब भी शिमला के देवदारों के बीच गूंजती है। अपनी शायरी के रूप में वे हमेशा जिंदा रहेंगे।
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