रेस्ट कैंप : सुबाथू में ठंडे पानी का आनंद लेते अमेरिकी सैनिक और ‘लवली रेड क्रॉस लेडी’

रेस्ट कैंप : सुबाथू में ठंडे पानी का आनंद लेते अमेरिकी सैनिक और ‘लवली रेड क्रॉस लेडी’
रेस्ट कैंप : सुबाथू में ठंडे पानी का आनंद लेते अमेरिकी सैनिक और ‘लवली रेड क्रॉस लेडी
हिमाचल बिजनेस। सुबाथू
1944 का जून का महीना, दूसरा विश्व युद्ध अपने निर्णायक मोड़ पर था, लेकिन शांत पहाड़ियों में बसे सुबाथू में एक अलग ही दृश्य दिखाई दे रहा था। यूएस नेशनल आर्काइव की यह दुर्लभ तस्वीर उस पल में ले जाती है, जब अमेरिकी सैनिक पिकनिक लंच के बाद सुबाथू के पहाड़ी झरने में ठंडे पानी का आनंद लेते दिखाई देते हैं। उनके साथ एक मुस्कुराती हुई रेड क्रॉस स्वयंसेविका भी मौजूद है।
यह दृश्य केवल एक सैर-सपाटे का क्षण नहीं, बल्कि युद्धकालीन तनाव के बीच राहत और मानवीय संवेदना का प्रतीक है। ब्रिटिश काल में सुबाथू एक महत्वपूर्ण सैन्य छावनी था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों के सैनिकों के लिए यह स्थान रेस्ट कैंप के रूप में उपयोग किया गया। अमेरिकी सैनिक मोर्चे से दूर आकर यहाँ आराम करते, प्रशिक्षण लेते और मानसिक तनाव से उबरते थे।
सैनिकों का मनोबल बढ़ातीं रेड क्रॉस की स्वयंसेविकाएँ
तस्वीर में दिखता पहाड़ी झरना उस समय के सुबाथू की प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाता है। स्वच्छ पानी, हरियाली और ठंडी हवा। युद्ध की भयावहता के बीच यह प्रकृति मानो सैनिकों को जीवन की सरल खुशियों की याद दिला रही थी। इस तस्वीर में एक लवली रेड क्रॉस लेडी का उल्लेख मिलता है, जो उस दौर में अमेरिकन रेड क्रॉस की भूमिका को दर्शाता है।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रेड क्रॉस की स्वयंसेविकाएँ जिन्हें अक्सर ‘Donut Dollies’ भी कहा जाता था, सैनिकों को भोजन, चिकित्सा सहायता, मनोरंजन और भावनात्मक सहारा प्रदान करती थीं। सैनिकों के साथ उनकी उपस्थिति केवल सेवा नहीं, बल्कि मनोबल बढ़ाने का प्रतीक थी। यही कारण है कि इस तस्वीर की ऐतिहासिक अहमियत है।
हँसी-ठिठोली के पल कैमरे में कैद
यह फोटो जून 1944 की है। यह वही समय था जब यूरोप में डी- डे के बाद मित्र राष्ट्रों की प्रगति जारी थी। भारत में तैनात सैनिक दक्षिण-पूर्व एशियाई मोर्चे से जुड़े अभियानों की तैयारी में थे। सुबाथू का यह दृश्य बताता है कि युद्ध केवल रणभूमि की गोलियों तक सीमित नहीं होता, उसके बीच भी इंसान हँसते हैं, प्रकृति में सुकून ढूंढते हैं और मानवीय रिश्तों को संजोते हैं।
यह तस्वीर इसलिए खास है क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सुबाथू की सैन्य भूमिका का प्रमाण और अमेरिकी सैनिकों की भारत में उपस्थिति का दस्तावेज है। यह तस्वीर रेड क्रॉस की मानवीय सेवा की झलक और सुबाथू के प्राकृतिक परिवेश का ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी है। सुबाथू की पहाड़ियाँ आज भी खामोश हैं, लेकिन इतिहास की यह तस्वीर उन हँसी-ठिठोली के पलों को अमर कर देती है।
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Jyoti maurya

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