260 साल बाद फिर से छपी गुलेर के राजकवि उत्तम की चर्चित कृति ‘दिलीप रंजनी’, रियासत का इतिहास कविता में लिखने का बिरला उदाहरण
260 साल बाद फिर से छपी गुलेर के राजकवि उत्तम की चर्चित कृति ‘दिलीप रंजनी’, रियासत का इतिहास कविता में लिखने का बिरला उदाहरण
विनोद भावुक। धर्मशाला
क्या आप जानते हैं कि 18वीं सदी में गुलेर रियासत का इतिहास कविता में लिख दिया गया था? जी हां, गुलेर के राजकवि उत्तम ने 1765-70 में ‘दिलीपरंजनी की रचना की थी। पुस्तक रियासत की प्रमुख घटनाओं का काव्यात्मक इतिहास प्रस्तुत करती है, जिसमें राजदरबार, युद्ध, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत चित्रण मिलता है। कम ही लोगों को पता है कि ‘दिलीपरंजनी’ की प्रति स्टेट म्यूज़ियम, शिमला में सुरक्षित है
260 साल बाद साल 2015 में ‘दिलीपरंजनी’ उस समय चर्चा में आई जब इंडियन एडवांस स्टडीज़ शिमला की गोल्डन जुबली सीरीज के तहत इतिहासकार स्वर्गीय करुणा गोस्वामी ने कवि उत्तम के अभूतपूर्व साहित्यिक कार्य को दुनिया के सामने लाने के लिए अंग्रेजी में 331 पेजों की शोधपरक पुस्तक ‘Diliparanjani : an 18th century chronicle of a hill state in verse’ की रचना की।
पेंटिंग के बीच कविता की गूंज
यूं तो धौलाधार के आंचल में बसी छोटी-सी गुलेर रियासत लघुचित्र कला के लिए विश्वविख्यात है। सत्रहवीं शताब्दी में यहां साहित्य और कला का ऐसा संगम हुआ, जिसने गुलेर को सांस्कृतिक मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिलाया।
राजकवि उत्तम इस सांस्कृतिक पुनर्जागरण के केंद्र में थे। राजा दिलीप के शासनकाल में साहित्य और कला को विशेष संरक्षण मिला। इसी दौर में कवि उत्तम को राजकवि घोषित किया गया।
उत्तम वैसे तो गुलेर के ही निवासी थे, किंतु उन्हें चंबा के राजा का राजाश्रय प्राप्त था। राजा दिलीप ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें फिर से गुलेर बुलाया और राजदरबार में सम्मानपूर्वक स्थापित किया। उत्तम ने गुलेर में कविता को इतिहास लेखन और सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण का सशक्त साधन बना कर अनूठा काम किया। यही कारण है कि उनकी कृति ‘दिलीप रंजनी’ आज भी चर्चित है।
कवि उत्तम के काम तक पहुँचने का रास्ता
सत्रहवीं शताब्दी में गुलेर में एक ओर लघुचित्र शैली विकसित हो रही थी, वहीं दूसरी ओर काव्य और इतिहास लेखन की परंपरा मजबूत हो रही थी। राजकवि उत्तम ने अपने काव्य के माध्यम से गुलेर की पहचान को स्थायी रूप दिया। ‘दिलीपारंजनी’ एक ऐसी ही कृति है, जो गुलेर का काव्यात्मक इतिहास प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ न केवल राजनीतिक घटनाओं का वर्णन करता है, बल्कि दरबार, समाज और संस्कृति का जीवंत चित्रण भी करता है
सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दी की गुलेर रियासत का इतिहास केवल युद्धों और संधियों में ही नहीं, बल्कि कविता में भी जीवित है, पर गुलेर के कवि उत्तम की लिखी ‘दिलीपारंजनी’ पुस्तक दुर्लभ मानी जाती है और वर्तमान में सामान्य पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं है। 260 साल इतिहासकार करुणा गोस्वामी ने कवि उत्तम की काव्य परंपरा को नए दृष्टिकोण से समझने का मार्ग प्रशस्त किया है। किताब ऑनलाइन खरीदी जा सकती है।
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