चंबा कितनी की दूर – दिल की बेचैनी और प्रेम की मासूमियत का प्रतीक लोकगीत जो सीधा दिल में उतर जाता है
चंबा कितनी की दूर – दिल की बेचैनी और प्रेम की मासूमियत का प्रतीक लोकगीत जो सीधा दिल में उतर जाता है
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। चंबा
रावी नदी किनारे बसा चंबा सिर्फ़ बर्फ़ीली चोटियों और हरी-भरी वादियों के लिए ही नहीं जाना जाता, यह नगर अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति के लिए भी मशहूर है। यहाँ का लोकसंगीत और लोकनृत्य लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है। खेतों में काम करते, ऊन कातते और त्योहारों की रातों में अलाव के आसपास हर जगह गीत गूंजते हैं।
इसी लोक-संस्कृति की सबसे मधुर अभिव्यक्तियों में से एक है ‘चंबा का गीत’। एक ऐसा सुर, जिसमें लोकशैली के पहाड़ी गीतों में चंबा कितनी दूर खास स्थान रखता है। सदियों से चंबा में गूँजते आ रहे इसे मूल रूप से गायक मोहित चौहान ने गाया है। लड़की अपनी माँ से पूछती है,’चंबा कितनी दूर?’ क्योंकि वहीं उसका प्रिय रहता है। सवाल दूरी का नहीं, दिल की बेचैनी और प्रेम की मासूमियत का प्रतीक है।
रोज़मर्रा से जुड़ा चंबा का संगीत
चंबा का लोक संगीत लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ा हुआ है। हर मौसम के लिए अलग गीत, प्रेम और बिछोह की कहानियाँ, वीरता और लोकगाथाएँ और धार्मिक आस्था की झलक। यह संगीत श्रम के बाद आत्मा का विश्राम है। चंबा की लोकधुनों में एक अलग ही रोमांटिक संवेदना है। प्रकृति और प्रेम का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इन गीतों में अक्सर एक दर्द छुपा होता है।
पहाड़ों से दूर जाने की मजबूरी और अपनी मिट्टी से अटूट लगाव। जाना भी है और रहना भी है, यह विरोधाभास गीतों को एक रसभरी पीड़ा दे देता है। कहा जाता है कि जो सुनना जानते हैं, उनके लिए कुदरत में संगीत बहता है। चंबा के गीत इस कहावत को सच साबित करते हैं। पहाड़ों की हवा, बहती नदियाँ, देवदार के जंगल, सब मानो इस धुन का हिस्सा बन जाते हैं।
कुदरत खुद गा रही लोकगीत
यह चंबा की सांस्कृतिक पहचान है और यह लोक जीवन की सादगी को दर्शाता है। यह प्रेम और प्रकृति के शाश्वत रिश्ते को उजागर करता है और यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है जब आधुनिक संगीत की तेज़ रफ्तार दुनिया में लोकधुनें पीछे छूटती जा रही हैं, तब ‘चंबा का गीत’ हमें याद दिलाता है कि असली संगीत वही है, जो दिल को छू ले।
चंबा के लोकगीत सुनते समय ऐसा लगता है जैसे प्रकृति स्वयं गा रही हो। चंबा की यह लोक विरासत सिर्फ़ सुनने के लिए नहीं, संभालने के लिए है। यह हमारी पहचान है, हमारी मिट्टी की खुशबू है। अगर हम इसे जीवित रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी पहाड़ों की उसी सादगी और प्रेम को लोकसंगीत में महसूस कर पाएंगी।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/annandale-a-tale-of-love-set-in-the-valleys-of-shimla-a-picture-of-this-field-appeared-on-a-postcard-in-1905/
