प्रो. तोबदन : कुल्लू के बैंक अधिकारी का लोक संस्कृति संरक्षण में कमाल, लाहुल–स्पीति, किन्नौर और कुल्लू की सांस्कृतिक स्मृतियों की संभाल
प्रो. तोबदन : कुल्लू के बैंक अधिकारी का लोक संस्कृति संरक्षण में कमाल, लाहुल–स्पीति, किन्नौर और कुल्लू की सांस्कृतिक स्मृतियों की संभाल
विनोद भावुक। कुल्लू
पश्चिमी हिमालय की सांस्कृतिक-भाषायी विरासत पर गंभीर अकादमिक हस्तक्षेप की बात हो और प्रो. तोबदन का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। 1944 में लाहुल की तोद घाटी में जन्मे तोबदन ने इतिहास, भाषाविज्ञान और लोक-संस्कृति के अंत:विषयी अध्ययन के माध्यम से लाहुल–स्पीति, किन्नौर और कुल्लू की सांस्कृतिक स्मृतियों को दस्तावेजीकरण किया है।
प्रो. तोबदन का कार्य-क्षेत्र पश्चिमी हिमालय के सीमांत भूभाग लाहुल, स्पीति, किन्नौर और ट्रांस-हिमालय—तक फैला है। उनकी पद्धति में फील्ड वर्क, मौखिक इतिहास, पांडुलिपि-अध्ययन और सामाजिक-भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण जैसी शोध-तकनीकों का संतुलित उपयोग मिलता है। वे लाहुल की तिब्बती भाषा के व्याकरणिक विश्लेषण और संरक्षण के लिए जाने जाते हैं।
कुंजम पत्रिका के जरिये लोक का संरक्षण
प्रो. तोबदन, जी एन डेवी के नेतृत्व में संचालित People’s Linguistic Survey of India के हिमाचल खंड के संपादक रहे। इस परियोजना का उद्देश्य भारत की लुप्तप्राय भाषाओं का प्रलेखन था। उन्होंने 2021 के एक साक्षात्कार में पश्चिमी हिमालय की लुप्तप्राय टांकरी लिपि के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. तोबदन ‘Society for Conservation and Promotion of Culture in Lahaul & Spiti’ के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं। इस संस्था की पत्रिका कुंजम (2005–2014) के प्रधान संपादक के रूप में उन्होंने लोककथाएँ, लोकगीत, व्याकरणिक आलेख और शोध-निबंध प्रकाशित किए। यह पत्रिका हिमालयी अध्ययन के शोधार्थियों के लिए संदर्भ सामग्री है।
विदेशों ने माना शोध का लोहा
प्रो. तोबदन की पुस्तकों में ‘History and Religions of Lahul (1984)’, ‘Spiti: A Study in Socio-Cultural Traditions (2015)’, ‘Ancient Lahaul and Himalaya (2021)’, ‘The Brave Soldiers of Lahaul (2022) और A Grammar of sTodpa प्रमुख हैं। Ancient Lahaul and Himalaya में उन्होंने तर्क दिया कि लाहुल में बौद्ध धर्म तिब्बती बौद्ध परंपरा के आगमन से पूर्व का है।
प्रो. तोबदन के कार्यों का उल्लेख अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं जॉन ब्रे, अरिक मोरान, ताशी त्सेरिंग, जॉन विंसेंट बेलेज़ा द्वारा किया गया है। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की शोधार्थी एलिज़ाबेथ स्टचबरी ने लाहुल पर प्रारंभिक स्थानीय शोध-प्रयास के रूप में उनके योगदान की सराहना की है। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उद्धृत इतिहासकार-भाषाविद हैं।
बैंक अधिकारी से इतिहासकार-भाषाविद् तक
कुल्लू घाटी में रहने वाले एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उद्धृत इतिहासकार-भाषाविद् बनने तक की प्रो. तोबदन की यात्रा प्रेरणादायक है। प्रो. तोबदन का जीवन-संदेश स्पष्ट है कि अपनी मातृभूमि की भाषा और परंपरा को समझना, संरक्षित करना और वैश्विक विमर्श में स्थापित करना ही सच्चा बौद्धिक कर्म है।
प्रो. तोबदन का कार्य हमें यह सिखाता है कि सीमांत भूगोल भी वैश्विक अकादमिक मानचित्र पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है। 2010 में लाहुल क्षेत्र में प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं के विरुद्ध उन्होंने प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण की वकालत की। उनका मानना है कि हिमालयी पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक ताने-बाने का संतुलन विकास-नीतियों से प्रभावित होता है।
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