शिमला का दुग्गू राम अमेरिका की सेना का सैनिक, फ्रांस के मोर्चे पर लड़ा पहला विश्व युद्ध
शिमला का दुग्गू राम अमेरिका की सेना का सैनिक, फ्रांस के मोर्चे पर लड़ा पहला विश्व युद्ध
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। शिमला
यह प्रेरक और रोचक कहानी है शिमला के देवदारों की वादियों से निकलकर विश्व युद्ध के मोर्चे तक पहुंचने वाला एक साहसी युवक की। 11 अगस्त 1893 को शिमला में जन्मे दुग्गू राम ने अपने जीवन से यह साबित किया कि सपनों की कोई सरहद नहीं होती। दुग्गू राम अमेरिका की सेना में भर्ती होकर पहले विश्व युद्ध में फ्रांस के मोर्चे पर लड़ने पहुंचे।
1914 में जब दुनिया युद्ध की आग में झुलसने लगी, उसी समय दुग्गू राम एक अमेरिकी यात्री के साथ सेवक के रूप में अमेरिका पहुंचे। 15 जून 1914 को उन्होंने अमेरिका में प्रवेश किया और फिलाडेल्फिया में बस गए। उनका जीवन यहीं नहीं रुका। 22 सितंबर 1917 को उन्होंने अमेरिकी सेना में भर्ती लेकर इतिहास रच दिया। वे 304वीं इंजीनियर रेजीमेंट की कंपनी ‘ई’ में शामिल हुए।
फ्रांस की धरती पर लड़ा शिमला का बेटा
9 जुलाई 1918 से 29 मई 1919 तक उन्होंने फ्रांस में सेवा दी। वे प्रथम विश्व युद्ध की निर्णायक लड़ाइयों में से शामिल रहे। 9 अक्टूबर 1918 को नैंटिलोइस में रासायनिक हथियारों का सामना भी किया। यह वह दौर था जब गैस हमले सैनिकों के लिए भयावह अनुभव बन चुके थे। 5 जून 1919 को न्यू जर्सी के कैंप डिक्स में उन्हें सम्मानपूर्वक छुट्टी दी गई।
फिलाडेल्फिया लौटकर उन्होंने शिपयार्ड में पेंटर के रूप में काम किया, फ्रांसेस से विवाह किया और नया जीवन शुरू किया। 10 दिसंबर 1943 को उनका निधन हुआ। उन्हें फिलाडेल्फिया नेशनल सिमिट्री में दफन किया गया। यह प्रेरणा है हर उस युवा के लिए जो सीमाओं से परे सपने देखता है।
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