कसौली का ‘क्लॉक टॉवर’ सुनाता है मेजर जनरल मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा की गौरवगाथा, सीमा पर ही नहीं, समाज में भी शांति स्थापित करने वाले आर्मी ऑफिसर

कसौली का ‘क्लॉक टॉवर’ सुनाता है मेजर जनरल मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा की गौरवगाथा, सीमा पर ही नहीं, समाज में भी शांति स्थापित करने वाले आर्मी ऑफिसर
कसौली का ‘क्लॉक टॉवर’ सुनाता है मेजर जनरल मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा की गौरवगाथा, सीमा पर ही नहीं, समाज में भी शांति स्थापित करने वाले आर्मी ऑफिसर
अजय शर्मा। कसौली (सोलन)
कसौली की वादियों में गूंजती घड़ी की टिक-टिक मानो यह कहती है कि साहस केवल युद्धभूमि में नहीं, इंसानियत बचाने में भी दिखता है। कसौली का ‘क्लॉक टॉवर’ उनकी गौरवगाथा ब्यान करता है। यह प्रेरक कहानी है मेजर जनरल मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा की, जिन्होंने विभाजन की आग में झुलसते भारत को संभालने में निर्णायक भूमिका निभाई।
कसौली केवल एक हिल स्टेशन नहीं, सैन्य अनुशासन और इतिहास का जीवंत साक्षी है। मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा भारतीय सेना के उन अग्रणी अधिकारियों में थे, जिन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना से लेकर स्वतंत्र भारत की सेना तक का समय देखा। वे कसौली छावनी के पहले भारतीय स्टेशन कमांडर बने। वे इसलिए याद किए जाते हैं, जिन्होंने सीमा पर ही नहीं, समाज में भी शांति स्थापित की।
शरणार्थियों को सुरक्षित निकालने की अग्नि परीक्षा
1947 में जब पंजाब और बंगाल सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में थे, तब ब्रिगेडियर (बाद में मेजर जनरल) चोपड़ा को 123 इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान सौंपी गई। अमृतसर-लाहौर सीमा पर उन्होंने हजारों शरणार्थियों को सुरक्षित निकाला और अटारी-वाघा सीमा चौकी की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही। हिंसक भीड़ के सामने खड़े होकर उन्होंने संयम और साहस से हालात काबू में किए।
एनआईएस पटियाला के निदेशक
कसौली और अंबाला में स्थित आर्मी स्कूल ऑफ फिजिकल ट्रेनिंग से मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा का विशेष जुड़ाव रहा। वे शारीरिक प्रशिक्षण के प्रबल समर्थक थे और खेलों में भी उत्कृष्ट रहे। सेना से सेवानिवृति के बाद में वे पटियाला स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स के निदेशक बने, जहाँ उन्होंने खेल और अनुशासन को नई दिशा दी।
सैनिक से राजनयिक तक
मोहिन्द्र सिंह चोपड़ा बाद में भारत के पहले राजदूत के रूप में फिलीपींस भेजे गए। उनके बाद ताइवान में भी उन्होंने राजनयिक दायित्व निभाया। उनकी आत्मकथा 1947: A Soldier’s Story विभाजन के सैन्य पक्ष को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जाती है। अमृतसर के Partition Museum में उनके संस्मरण और स्मृतिचिह्न प्रदर्शित हैं। 84 साल की उम्र में दिल्ली में उनका निधन हुआ।
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Jyoti maurya

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