डीडी कॉन्ट्रैक्टर’ : कांगड़ा को मिट्टी के आधुनिक घर बनाने का हुनर सिखाने वाली अमरीकी आर्किटेक्चर
डीडी कॉन्ट्रैक्टर’ : कांगड़ा को मिट्टी के आधुनिक घर बनाने का हुनर सिखाने वाली अमरीकी आर्किटेक्चर
विनोद भावुक। धर्मशाला
धौलाधार की गोद में बसे धर्मशाला और सिद्धबाड़ी के आसपास यदि आपको मिट्टी, पत्थर और बांस से बने घर दिखें जो पहाड़ों में घुल-मिल जाते हों, तो समझिए यह ‘डीडी कॉन्ट्रैक्टर’ की दुनिया है। अमेरिका में जन्मी, लेकिन कांगड़ा की मिट्टी में रची-बसीं डेलिया नारायण ‘डीडी’ कॉन्ट्रैक्टर ने साबित किया कि सस्टेनेबल आर्किटेक्चर केवल डिज़ाइन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।
‘डीडी कॉन्ट्रैक्टर’ की प्रमुख कृतियों में निष्ठा रुरल हेल्थ, एजुकेशन एंड एनवायरमेंट सेंटर, संभावना इन्स्टीट्यूशन ऑफ पब्लिक पॉलिसी एंड पॉलिटिक्स और धर्मलाय इंस्टीट्यूट शामिल हैं। स्थानीय मिट्टी, पत्थर, बांस और देवदार का सीमित उपयोग, सीढ़ियों का कलात्मक और उपयोगी समावेश, प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन और कम-अपशिष्ट निर्माण इन इमारतों की विशेषता है।
कुदरत से संवाद करने वाली इमारतें
‘डीडी कॉन्ट्रैक्टर’ का जन्म 11 अक्टूबर 1929 को मिनियापोलिस (अमेरिका) में हुआ। कला की पृष्ठभूमि वाले परिवार में पली-बढ़ीं डीडी ने औपचारिक रूप से आर्किटेक्चर नहीं पढ़ा, लेकिन वे स्व-शिक्षित गज़ब की वास्तुकार थीं। युवावस्था में फ्रैंक लॉयड राइट के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने तय किया कि इमारतें प्रकृति के साथ संवाद करें, उससे टकराएँ नहीं।
1950–60 के दशक में भारत आने के बाद वे अंततः 1970 के दशक में कांगड़ा घाटी के कलाकार ग्राम अंद्रेटा और फिर सिद्धबाड़ी में बस गईं। यहीं से उनकी असली पहचान बनी ‘मिट्टी की आर्किटेक्ट की। डीडी कॉन्ट्रैक्टर ने कांगड़ा और धर्मशाला क्षेत्र में 15 से अधिक मिट्टी- पत्थर और बांस के प्रयोग से घर और कई संस्थान तैयार किए।
पर्यावरण अनुकूल वास्तुकला को पहचान
उनका मानना था कि इमारत और धरती का रिश्ता विवाह जैसा पवित्र और संतुलित हो। 2019 में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोबिन्द ने उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो महिलाओं के लिए भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। उन Earth Crusader (2016) और Didi Contractor: Marrying the Earth to the Building (2017) दो डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनीं।
5 जुलाई 2021 को सिद्धबाड़ी में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन कांगड़ा की पहाड़ियों में खड़े उनके बनाए घर आज भी उनकी सोच का जीवंत प्रमाण हैं। उन्होंने कांगड़ा में पर्यावरण-अनुकूल वास्तुकला को स्थानीय पहचान देकर ग्रामीण कारीगरों और युवाओं को प्रशिक्षण व रोजगार दिया। पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक जरूरतों से जोड़कर प्रकृति-सम्मत जीवनशैली का संदेश दिया।
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