जम्मू- कश्मीर रियासत के आखिरी 50 सालों का हिसाब और कांगड़ा के मेजर जनरल जनक सिंह कटोच की भूमिका पर किताब

जम्मू- कश्मीर रियासत के आखिरी 50 सालों का हिसाब और कांगड़ा के मेजर जनरल जनक सिंह कटोच की भूमिका पर किताब
जम्मू- कश्मीर रियासत के आखिरी 50 सालों का हिसाब और कांगड़ा के मेजर जनरल जनक सिंह कटोच की भूमिका पर किताब
विनोद भावुक। धर्मशाला
‘ए कश्मीर नाइट एंड द लास्ट 50 इयर्स ऑफ द प्रिंसली स्टेट ऑफ जे के’ एक ऐतिहासिक जीवनी है, जो कांगड़ा जिला के खैरा गांव से संबंध रखने वाले मेजर जनरल जनक सिंह कटोच के जीवन पर आधारित है। इस चर्चित पुस्तक के लेखक सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल जी.एस. कटोच मेजर जनरल जनक सिंह के पोत्र हैं।
यह पुस्तक महज एक जीवनी नहीं, बल्कि जम्मू और कश्मीर रियासत के अंतिम 50 वर्षों का एक सजीव इतिहास है, जिसे एक सैनिक और प्रशासक की आंखों से देखा और समझा गया है। पुस्तक जम्मू-कश्मीर रियासत के विलय की उस कहानी बयां करती है, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण और नाटकीय अध्यायों में से है। पुस्तक अक्टूबर 1947 के ऐतिहासिक निर्णय की पृष्ठभूमि बयां करती है।
प्रधानमंत्री की भूमिका में मेजर जनरल
मेजर जनरल जनक सिंह कटोच का जन्म 7 अगस्त 1872 को कांगड़ा जिले के खैरा गांव में हुआ था। एक प्रतिष्ठित सैन्य अधिकारी के तौर पर उन्होंने महाराजा हरि सिंह की जम्मू और कश्मीर राज्य सेना में 47 वर्षों तक सेवा की। उन्होंने गिलगित एजेंसी में जम्मू-कश्मीर राइफल्स की दूसरी बटालियन की कमान संभाली, जो उस समय रियासत की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य चौकियों में से एक थी।
सैन्य सेवा के अलावा वह 1929 से 1931 तक महाराजा हरि सिंह के प्रशासन में सेना मंत्री और राजस्व मंत्री भी रहे। 11 अगस्त 1947 को, जब भारत का विभाजन हो चुका था, महाराजा हरि सिंह ने सेवानिवृत्त मेजर जनरल जनक सिंह को रियासत का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। यह नियुक्ति एक अस्थायी उपाय थी, क्योंकि रियासत एक अत्यंत उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही थी।
पिता के बाद बेटा बना महाराजा के सैन्य सलाहकार
जनक सिंह के नेतृत्व में ही जम्मू-कश्मीर ने भारत और पाकिस्तान के साथ स्टैंडस्टिल समझौते पर हस्ताक्षर करने की पहल की, जिसका उद्देश्य संचार, आपूर्ति और अन्य मामलों को यथावत जारी रखना था । पाकिस्तान ने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, पर भारत ने इनकार कर दिया। तभी पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर घाटी पर आक्रमण कर दिया।
स्थिति बेहद विकट थी। 14 अक्टूबर 1947 को जनक सिंह ने पद से मुक्त होने का अनुरोध किया, जिसके बाद 15 अक्टूबर को मेहर चंद महाजन को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। महाराजा हरि सिंह ने मेजर जनक सिंह के सबसे बड़े पुत्र, लेफ्टिनेंट कर्नल कश्मीर सिंह कटोच की सेवाएं अपने सैन्य सलाहकार के रूप में लेने का अनुरोध किया, जिसे भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया।
पुस्तक में शामिल कई प्रसंग
आखिरकार, 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए, जिसे गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने अगले दिन स्वीकार किया। इसके बाद भारतीय सेना को श्रीनगर एयरलिफ्ट किया गया, जिसने शहर को कबायलियों से बचाया। इस तरह जम्मू- कश्मीर भारत में शामिल हुआ।
यह पुस्तक केवल राजनीतिक और सैन्य इतिहास तक सीमित नहीं है। इसमें मेजर जनक सिंह के बचपन, उनके पैतृक गांव के किस्से और उनके परिवार के बारे में भी रोचक जानकारी दी गई है। पुस्तक का ढांचा एक रात की यात्रा के इर्द-गिर्द बुना गया है, जब कबायली हमले के कारण वह श्रीनगर से जम्मू की ओर बनिहाल कार्ट रोड से होते हुए ड्राइव कर रहे थे।
योद्धाओं की विरासत
मेजर जनरल जनक सिंह के तीनों पुत्रों ने सेना में अपना योगदान दिया। सबसे बड़े पुत्र लेफ्टिनेंट जनरल कश्मीर सिंह कटोच दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इटली में वीरता के लिए मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित हुए। ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह कटोच ने 5 गोरखा राइफल्स में सेवा की और एवीएसएम से सम्मानित हुए। लेफ्टिनेंट कर्नल राजेंद्र सिंह कटोच ने जे के बॉडीगार्ड कैवलरी में कमीशन प्राप्त किया।
‘ए कश्मीर नाइट’ पुस्तक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ की एक मूल्यवान ऐतिहासिक दस्तावेज है। पुस्तक एक सैनिक, एक प्रशासक और एक परिवार की कहानी के माध्यम से हमें उन जटिल परिस्थितियों से रूबरू कराती है, जिनके चलते जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय हुआ। यह उन गुमनाम नायकों की कहानी है, जिन्होंने इतिहास के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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Jyoti maurya

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