खामोश दीवारों से हेरिटेज साइट तक : अतीत को संजोते हुए भविष्य को रोशन कर सकता है रेहलू किला
खामोश दीवारों से हेरिटेज साइट तक : अतीत को संजोते हुए भविष्य को रोशन कर सकता है रेहलू किला
विनोद भावुक। शाहपुर
कांगड़ा जिला के शाहपुर इलाके के रेहलू किले की दीवारें आज खामोश हैं, लेकिन सही योजना और सामुदायिक भागीदारी से ये फिर इतिहास की गूंज सुनाने लगेंगी। रेहलू किला एक हेरिटेज साइट के रूप में, अतीत को संजोते हुए भविष्य को रोशन कर सकता है। रेहलू किले को पूरी तरह बहाल करना संभव नहीं, लेकिन एडैप्टिव रीयूज़ के जरिए इसे हेरिटेज हब बनाया जा सकता है।
धर्मशाला एक अंतरराष्ट्रीय टूरिस्ट हॉटस्पॉट है। पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के शोधार्थी मयंक सिंह की स्टडी वकालत करती है कि रेहलू को धर्मशाला-रेहलू-नूरपुर हेरिटेज सर्किट से जोड़ा जा सकता है। मजबूत बाहरी दीवारों की मरम्मत कर परिसर को हेरिटेज बैंक्वेट हॉल, ओपन-एयर म्यूज़ियम तथा लोक-संगीत और कला महोत्सव स्थल में बदला जा सकता है।
सीमाओं की जंग और बदलती हुकूमतें
शाहपुर का रेहलू इलाका बार- बार विवादों का केंद्र रहा। चंबा के राजा प्रताप सिंह वर्मन ने कटोच शासकों को हराकर इस किले पर कब्ज़ा किया। मुगल काल में अकबर के शासन में टोडरमल की अगुवाई में यह इलाका मुगलों के अधीन आया। बाद में चंबा के राजा राज सिंह और कांगड़ा के महाराजा संसार चंद के बीच संघर्ष हुआ। नेरटी गांव में राजा राज सिंह की मौत पर किला चंबा के शासकों के पास रहा।
1821 में सिख गवर्नर देसा सिंह मजीठिया ने महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर इस किले को घेरा। 1846 के प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने रेहलू किले पर कब्ज़ा कर लिया। 1905 के कांगड़ा भूकंप ने किले को भारी क्षति पहुंचाई। किले में रहने वाला राजौरी का शाही परिवार 1947 के बाद पाकिस्तान चला गया और किला वीरान होता गया।
छोटा किला, बड़ी रणनीति
रेहलू किला बेशक छोटा है, लेकिन बड़ी रणनीति के तहत बनाया गया है। किले का लेआउट चौकोर है, हर कोने पर आठ-कोणीय वॉचटावर हैं। 10 मीटर ऊंची और एक मीटर मोटी दीवारें, उत्तर-पूर्व दिशा में 5 मीटर चौड़ा मुख्य द्वार, बीच में 1 मीटर व्यास का कुआँ, दो आयताकार टैंक, डबल स्लिट एम्ब्रेशर और लकड़ी के प्लेटफॉर्म के सॉकेट।
स्थानीय सैंडस्टोन से बना यह किला “प्रांतर-दुर्गा” शैली का उदाहरण है, जो नूरपुर, कांगड़ा, कोटला और गुलेर के किलों से मिलता-जुलता है। आज किले का अधिकांश हिस्सा खंडहर में बदल चुका है। मुख्य द्वार गायब है, तीन वॉचटावर ध्वस्त, दक्षिण-पश्चिम की दीवार आधी टूटी और पेड़-पौधों और मानवीय हस्तक्षेप से संरचना बेहद कमजोर हो चुकी है।
ब्रिटिश सर्वे (1924-25) के अनुसार, कांगड़ा जिले में 282 किले थे—पर कई को कभी पर्याप्त संरक्षण नहीं मिला। पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के शोधार्थी मयंक सिंह की स्टडी बताती है कि यह किला केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि पहाड़ी राजनीति, सैन्य रणनीति और लोक-स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज है।
हेरिटेज साइट बनने पर किले से लोकल इकॉनमी को बूस्ट मिलेगा और रख-रखाव में रोजगार के अवसर मिलेंगे। ट्रैवल एजेंसियां, होम-स्टे, रेस्टोरेंट को बढ़ावा मिलने से स्थानीय हस्तशिल्प और कृषि उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी। इस तरह विरासत संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं। यदि रेहलू किला आय का स्रोत बनेगा, तो लोग खुद इसकी रक्षा में आगे आएंगे।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/research-on-mosquitoes-in-kasauli-helped-save-millions-of-lives-in-asia-and-africa-alexander-sinton-was-a-pioneer-in-the-fight-against-malaria/
