शिमला के लेफ्टिनेंट जनरल दौलत पार्क से भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का कनेक्शन

शिमला के लेफ्टिनेंट जनरल दौलत पार्क से भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का कनेक्शन
शिमला के लेफ्टिनेंट जनरल दौलत पार्क से भारत के पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का कनेक्शन
हिमाचल बिजनेस स्पेशल । शिमला
दौलत सिंह 8 मई 1961 8 मई 1961 को शिमला में सेना की वेस्टर्न कमांड का जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ अपॉइंट किया गया और 22 नवंबर 1963 तक वे इस पद पर रहे। 1962 में, डिफेंस सर्विसेज़ स्टाफ कॉलेज के कमांडेंट और उस समय के मेजर जनरल सैम मानेकशॉ के खिलाफ कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी का ऑर्डर दिया, जिसकी अध्यक्षता का दौलत सिंह कर रहे थे।
दौलत सिंह के अंडर कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी ने मानेकशॉ को बरी कर दिया, जिससे उनका आर्मी करियर बच गया। मानेकशॉ बाद में भारतीय सेना के 7वें चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ बने। उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना को शानदार जीत दिलाई। वे इस जीत के नायक बन कर उभरे और और भारत के पहले फील्ड मार्शल बने।
मानेकशॉ ने किया दौलत सिंह पार्क का लोकार्पण
हिमाचल प्रदेश सरकार ने दौलत सिंह की विशिष्ट सेवा की स्मृति में शिमला के रिज मैदान पर दौलत सिंह पार्क का निर्माण कर नागरिकों को समर्पित किया। पार्क में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। 2 अप्रैल 1964 को इस पार्क का उद्घाटन हुआ। इस पार्क का लोकार्पण उस समय के लेफ्टिनेंट जनरल और बाद में फील्ड मार्शल बने सैम मानेकशॉ ने किया।
शिमला के दौलत सिंह पार्क में स्थापित लेफ्टिनेंट जनरल दौलत सिंह की प्रतिमा न केवल एक सैन्य अधिकारी को श्रद्धांजलि है, बल्कि राष्ट्र सेवा, दूरदर्शिता और बलिदान की अमर गाथा भी सुनाती है। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने भारतीय सेना का नेतृत्व दूरदर्शिता और रणनीतिक क्षमता के साथ किया।
भारत-चीन युद्ध में वेस्टर्न कमांड को किया लीड
4 जनवरी 1911 में लाहौर में जन्मे दौलत सिंह ने ब्रिटिश भारतीय सेना में कमीशन लिया और दूसरे विश्वयुद्ध में भाग लिया। देश की आजादी के बाद वे भारतीय सेना के अधिकारी बने। वे भारतीय सेना के उन वरिष्ठ अधिकारियों में गिने जाते है, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद के चुनौतीपूर्ण दौर में भारतीय सेना को मजबूत दिशा दी।
1960 के दशक की शुरुआत में देश को सीमाई और आंतरिक सुरक्षा की कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे समय में दौलत सिंह का नेतृत्व निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वेस्टर्न कमांड को लीड किया।
हेलीकॉप्टर हादसे ने छीन लिया कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व
22 नवंबर 1963 को जम्मू-कश्मीर में एक टोही अभियान के दौरान हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनका जीवन असमय समाप्त हो गया। राष्ट्र के लिए यह बड़ी क्षति थी। वे अंतिम सांस तक सक्रिय ड्यूटी पर थे, जो उनके कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व को दर्शाता है। दौलत सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि नेतृत्व केवल पद नहीं, जिम्मेदारी है।
शिमला का दौलत पार्क शांत विश्राम स्थल ही नहीं, बल्कि देशभक्ति और प्रेरणा का केंद्र है। दौलत सिंह सीख देते हैं कि दूरदर्शिता और रणनीति से कठिन परिस्थितियों पर विजय पाई जा सकती है। पर्यटक जब इस प्रतिमा को निहारते हैं, तो उन्हें केवल एक सैन्य अधिकारी की छवि नहीं दिखती, बल्कि समर्पण और साहस की एक जीवंत मिसाल दिखाई देती है।
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Jyoti maurya

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