शिमला ने जगाया मोहन राकेश के भीतर का रचनाकार, आधुनिक हिंदी नाटक के बने महान शिल्पकार

शिमला ने जगाया मोहन राकेश के भीतर का रचनाकार, आधुनिक हिंदी नाटक के बने महान शिल्पकार
शिमला ने जगाया मोहन राकेश के भीतर का रचनाकार, आधुनिक हिंदी नाटक के बने महान शिल्पकार
बिजनेस स्पेशल। शिमला
औपनिवेशिक इमारतों के बीच देवदारों की खुशबू और धुंध से ढकी पहाड़ियों के बीच बसा शिमला साहित्य और रंगमंच की एक जीवंत प्रयोगशाला है। शिमला की इन्हीं वादियों में कुछ समय तक अध्यापन करते हुए आधुनिक हिंदी नाटक के शिल्पकार मोहन राकेश ने अपनी रचनात्मक दृष्टि को नई दिशा दी। अपने करियर के आरंभिक वर्षों में वे शिमला के प्रतिष्ठित बिशप कॉटन स्कूल में हिंदी पढ़ाने आए थे।
शिमला की शांत जलवायु और चिंतनशील वातावरण ने उनके भीतर के लेखक को और गहराई दी। यहीं अध्यापन के दौरान उनके स्टूडेंट्स रहे रस्किन बॉन्ड आगे चलकर प्रसिद्ध लेखक बने। शिमला में शिक्षण के अनुभव ने उन्हें मध्यवर्गीय जीवन, संबंधों और मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों को करीब से देखने का अवसर दिया, जो आगे चलकर उनके नाटकों की आत्मा बना।
नाटकों में शिमला के शांत वातवरण की झलक
1958 में लिखा गया उनका ऐतिहासिक नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी रंगमंच में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। यह पहला आधुनिक हिंदी नाटक माना जाता है, जिसने परंपरागत शैली से हटकर संवेदनशील मनोवैज्ञानिक यथार्थ प्रस्तुत किया। इसके बाद उनके ‘आधे-अधूरे’ नाटक ने शहरी मध्यवर्गीय परिवार की टूटती संरचना और बदलते मूल्यों को मार्मिक ढंग से चित्रित किया।
मोहन राकेश का एक और महत्वपूर्ण नाटक ‘लहरों के राजहंस’ बौद्ध कथा पर आधारित है, जिसमें त्याग और उसके पारिवारिक प्रभावों का गहन विश्लेषण मिलता है। मोहन राकेश के नाटकों में जो अंतर्द्वंद्व, संवेदनशीलता और अस्तित्ववादी प्रश्न दिखाई देते हैं, उनमें शिमला के शांत पहाड़ी वातावरण की झलक मिलती है।
शिमला ने जगाया भीतर का रचनाकार
शिमला प्रवास ही वह दौर था जब मोहन राकेश नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक लेखन की ओर अग्रसर हुए। शिमला ने उनके भीतर के रचनाकार को दिशा दी और हिंदी रंगमंच को उसका आधुनिक चेहरा मिला। वे नाटककार के रूप में शहरी मध्यवर्गीय संकटों को मंच पर लाये और उन्होंने हिंदी नाटक को आधुनिक मनोवैज्ञानिक यथार्थ दिया।
शिमला की वादियों में बिताया गया मोहन राकेश का समय केवल एक अध्यापक का अध्याय नहीं था, वह आधुनिक हिंदी रंगमंच की तैयारी का स्वर्णिम काल था। शिमला के प्रवास ने मोहन राकेश की भाषा को सरल, संवादप्रधान और प्रभावशाली बनाया। उनके लेखन की यही खूबियां उनके नाटकों का एक बड़ा मजबूत पक्ष है।
फिल्मों- नाटकों में जिंदा रचनाकर्मी
8 जनवरी 1925 को अमृतसर में जन्मे मदन मोहन गुगलानी ने पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से अंग्रेज़ी और हिंदी में एम.ए. किया। वे मोहन राकेश के नाम से मशहूर हुये। 1968 में मोहन राकेश को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया। 1971 में उन्हें जवाहर लाल नेहरू फोलोशिप मिली, हालांकि वे इसे पूर्ण नहीं कर सके।
3 दिसंबर 1972 को दिल्ली में मोहन राकेश का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी मंचों पर जीवित हैं और मन को आत्ममंथन की ओर प्रेरित करती हैं। प्रसिद्ध फिल्मकार मानी कौल ने उनकी कहानी ‘उसकी रोटी’ और नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर फिल्में बनाईं। उनकी रचनाएँ आज भी भारत और विदेशों में मंचित होती हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि उनकी लेखनी समय से आगे थी।
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Jyoti maurya

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