द एंटीक्विटीज़ ऑफ कांगड़ा’ का खुलासा, पुरातन सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा कांगड़ा, पद्मश्री डॉ. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने मिट्टी में दबे इतिहास को खोद कर निकाला बाहर

द एंटीक्विटीज़ ऑफ कांगड़ा’ का खुलासा, पुरातन सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा कांगड़ा, पद्मश्री डॉ. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने मिट्टी में दबे इतिहास को खोद कर निकाला बाहर
द एंटीक्विटीज़ ऑफ कांगड़ा’ का खुलासा, पुरातन सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रहा कांगड़ा, पद्मश्री डॉ. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने मिट्टी में दबे इतिहास को खोद कर निकाला बाहर
हिमाचल बिजनेस। धर्मशाला
कांगड़ा जिला की धरोहर को दुनिया के सामने लाने का ऐतिहासिक काम कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास के पहले प्रोफेसर और पद्मश्री से सम्मानित महान विद्वान डॉ. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने किया है। डॉ. चक्रवर्ती ने कांगड़ा घाटी का गहन पुरातात्विक सर्वेक्षण कर यहां की समृद्ध विरासत को अमर कर दिया।
प्रो. चक्रवर्ती का कांगड़ा घाटी से बेहद खास रिश्ता रहा है। 1980 से 2008 के बीच उन्होंने कांगड़ा घाटी को भी अपने शोध का केंद्र बनाया। उन्होंने जमीन पर खुद उतरकर खुदाई की और कांगड़ा जनपद की मिट्टी में दबे इतिहास को खोद कर बाहर निकाला। प्रो. चक्रवर्ती ने एस.जे. हसन के सहयोग से 1984 में ‘द एंटीक्विटीज़ ऑफ कांगड़ा’ नामक पुस्तक लिखी।
इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति की पड़ताल
‘द एंटीक्विटीज़ ऑफ कांगड़ा’ पुस्तक कांगड़ा के इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति पर प्रकाश डालती है। इसमें उन्होंने कांगड़ा के किलों, मंदिरों, मूर्तियों और अन्य ऐतिहासिक धरोहरों का विस्तृत वर्णन किया है। पुस्तक ने कांगड़ा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को विदेशों में भी पहचान दिलाई। आज भी जब कोई शोधार्थी कांगड़ा के इतिहास पर काम करता है, तो वह इस पुस्तक का सहारा लेता है।
प्रो. चक्रवर्ती ने कांगड़ा घाटी के विभिन्न हिस्सों का दौरा किया और यहां बिखरे पुरातात्विक अवशेषों का दस्तावेजीकरण किया। उन्होंने न सिर्फ प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों का अध्ययन किया, बल्कि उन छोटी-छोटी बस्तियों और स्थलों को भी खोजा। उनके शोध ने साबित किया कि कांगड़ा घाटी प्राचीनकाल से ही एक समृद्ध सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र रही है।
कैम्ब्रिज में प्रोफेसरशिप हासिल करने वाले पहले भारतीय
27 अप्रैल 1941 को कोलकाता में जन्मे दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। 1965 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद वह दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर रहे और फिर 1990 में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई पुरातत्व के अध्यापन पद का निमंत्रण मिला।
डॉ. चक्रवर्ती प्राचीन भारतीय इतिहास के क्षेत्र में कैम्ब्रिज में प्रोफेसरशिप हासिल करने वाले पहले व्यक्ति बने। यह उनकी विद्वता और मेहनत का ही परिणाम था कि एक भारतीय विद्वान दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बना। उन्होंने हमेशा भारतीय इतिहास अनुसंधान में शैक्षणिक कठोरता लाने का प्रयास किया है।
नए सिरे से लिख रहे भारत का इतिहास
डॉ. चक्रवर्ती के शोध का तरीका बेहद वैज्ञानिक और तथ्यपरक रहा है। वह किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले गहन क्षेत्रीय अध्ययन और प्रमाणों की जांच करते हैं। उन्हें 2019 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्हें भारतीय पुरातत्व सोसायटी, दिल्ली ने गुरुदेव रानाडे पुरस्कार और एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट. की उपाधि दी।
सेवानिवृत्ति के बाद प्रो. चक्रवर्ती इतिहास लेखन में सक्रिय हैं। वह दिल्ली स्थित विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में डिस्टिंग्विश्ड फेलो हैं और ग्यारह खंडों वाली श्रृंखला प्राचीन भारत का इतिहास के संपादक हैं। इस श्रृंखला के माध्यम से वह भारत के प्राचीन इतिहास को नए सिरे से प्रस्तुत कर रहे हैं। वे हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो इतिहास को जानने का जुनून रखता है।
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Jyoti maurya

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