रंगों से खेलने वाले ब्रिटिश इंजीनियर जॉर्ज स्ट्रैहन, शिमला में तीन बार जीता था वायसराय पुरस्कार
रंगों से खेलने वाले ब्रिटिश इंजीनियर जॉर्ज स्ट्रैहन, शिमला में तीन बार जीता था वायसराय पुरस्कार
हिमाचल बिजनेस। शिमला
सवा सदी पहले ब्रिटिश शिमला में हर साल भव्य कला प्रदर्शनी लगती थी, जिसमें देश-विदेश के उम्दा कलाकार अपनी कृतियां पेश करते थे। इस प्रदर्शनी का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान था वायसराय पुरस्कार। कर्नल जॉर्ज स्ट्रैहन इकलौते पेंटर थे, जिन्होंने लगातार तीन इस पुरस्कार पर कब्जा किया। इंजीनियर होने के साथ-साथ वे उत्कृष्ट चित्रकार, खगोलशास्त्री और संगीतकार भी थे।
ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में हर साल होने वाली वार्षिक कला प्रदर्शनी में जॉर्ज स्ट्रैहन हिस्सा लेते थे। उनके चित्रों में हिमालय की भव्यता, भारतीय प्रकृति की कोमलता और पहाड़ों के अद्भुत नजारे होते थे। उनकी चित्रकला इतनी मनमोहक और उत्कृष्ट थी कि इस कलाकार ने तीन बार वायसराय पुरस्कार जीतकर कला जगत में मिसाल कायम की।
मां का तोहफा जिसने बदल दी जिंदगी
जॉर्ज स्ट्रैहन की इस कलात्मक प्रतिभा के पीछे उनकी मां का एक अनमोल तोहफा था। जब वह महज 15 साल के थे, तो उनकी मां ने उन्हें जॉन रस्किन की किताब ‘मॉडर्न पेंटर्स’ भेंट की। किताब ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। इस किताब ने उन्हें प्रकृति को देखना सिखाया; उन्होंने प्रकृति और कला के बारे में जो कुछ भी सीखा, वह इसी से सीखा।
स्ट्रैहन एक कुशल इंजीनियर और सर्वेक्षक थे। 1860 में वह ब्रिटिश सेना के इंजीनियर के रूप में भारत आए। रुड़की में तैनाती के बाद वह गंगा नहर के सर्वेक्षण में जुटे। 1862 में वह सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़े और फिर हिमालय की बर्फीली चोटियों और दुर्गम घाटियों को नापने का काम शुरू किया। वे जिन क्षेत्रों का वह सर्वेक्षण करते थे, वहां के नजारों को कैनवास पर उतारते थे।
कैनवास पर उतार दी शिमला की वादियां
शिमला में कला प्रदर्शनियों में भाग लेने के अलावा स्ट्रैहन का इस शहर से और भी जुड़ाव रहा। वह अक्सर शिमला आते-जाते रहते थे। यहां की पहाड़ियां, घने जंगल और ब्रिटिश वास्तुकला से सजी इमारतें उनके चित्रों का विषय बनीं। वह एक कुशल खगोलशास्त्री थे और रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी के फेलो बने। वह एक कुशल सेलो वादक भी थे।
1888 से 1894 तक वह ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के अधीक्षक रहे। 1894 में वह डिप्टी सर्वेयर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद वह कुछ समय देहरादून में रहे और गर्मियों में कश्मीर जाकर पर्वतारोहण करते थे। 7 जनवरी 1911 को लंदन के हैम्पस्टेड में उनका निधन हो गया। वह एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने हिमालय को नापा, उसे कैनवास पर उतारा।
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