50 करोड़ साल पहले उथले समंदर के नीचे था स्पीति का इलाका, जीवाश्म की खोज ने अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक मानचित्र पर दिलाई स्पीति को जगह
50 करोड़ साल पहले उथले समंदर के नीचे था स्पीति का इलाका, जीवाश्म की खोज ने अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक मानचित्र पर दिलाई स्पीति को जगह
विनोद भावुक। शिमला
स्पीति घाटी को लोग एक ठंडी रेगिस्तानी घाटी के तौर पर जानते हैं, लेकिन कैम्ब्रियन काल (लगभग 50–51 करोड़ वर्ष पहले) में यह इलाका उथले समुद्र के नीचे था। इसी समुद्री वातावरण में रहने वाले एक जीवाश्म की खोज ने स्पीति को अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक मानचित्र पर खास जगह दिलाई। इसी स्पीति की चट्टानों में विज्ञान का इतिहास छुपा है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि स्पीति घाटी कभी वैश्विक विज्ञान की सुर्ख़ियों में रही है। 19वीं सदी के महान ब्रिटिश भूवैज्ञानिक और जीवाश्म विज्ञानी जॉन विलियम साल्टर (1820–1869) के नाम पर स्पीति की धरती में मिले एक प्राचीन समुद्री जीव को अमर कर दिया गया। विलियम साल्टर के सम्मान में इस जीव का नाम ओरिक्टोसेफालस साल्टेरी रखा गया।
ओरिक्टोसेफालस साल्टेरी : स्पीति की वैज्ञानिक पहचान
यह जीवाश्म पाराहियो नदी के किनारे स्पीति क्षेत्र की पाराहियो फॉर्मेशन में पाया गया। यह त्रिलोबाइट वुलीयुआन चरण का प्रतिनिधि है। इसी के आधार पर वैज्ञानिकों ने एक पूरा ‘ओरिक्टोसेफालस साल्टेरी ज़ोन’ परिभाषित किया। यह खोज न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में कैम्ब्रियन काल की परतों की आपसी तुलना के लिए बेहद अहम मानी जाती है।
जॉन विलियम साल्टर ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के प्रमुख जीवाश्म विज्ञानी थे। उन्हें त्रिलोबाइट्स का सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने ब्रिटेन के अलावा भारत, वेल्स, स्कॉटलैंड और यूरोप की चट्टानों पर काम किया। स्पीति से मिले त्रिलोबाइट पर भले उन्होंने स्वयं फील्डवर्क न किया हो, लेकिन उनके वैज्ञानिक योगदान इतने प्रभावशाली थे कि भारतीय हिमालय में मिली प्रजाति उनके नाम पर रखी गई।
स्पीति: पर्यटन नहीं, विज्ञान की भी राजधानी
आज जब स्पीति को सिर्फ़ ट्रेकिंग और पर्यटन के नज़रिये से देखा जाता है, ओरिक्टोसेफालस साल्टेरी याद दिलाता है कि यह इलाका पृथ्वी के शुरुआती जीवन को समझने की कुंजी और भारतीय भूविज्ञान की अंतरराष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है। स्पीति में मिला जीवाश्म इस बात की भी पुष्टि करता है कि हिमालय केवल युवा पर्वत नहीं, बल्कि गहरे समय का साक्षी है।
जॉन विलियम साल्टर का जीवन व्यक्तिगत संघर्षों से भरा रहा और 1869 में उनका दुखद अंत हुआ, लेकिन उनकी वैज्ञानिक विरासत स्पीति की चट्टानों में, पाराहियो नदी के किनारे जीवाश्मों में आज भी जीवित है, जो हमें बताते हैं कि जीवन कितना पुराना और कितना अद्भुत है। यह सम्मान इस बात का प्रतीक है कि साल्टर का काम हिमालय जैसी दूरस्थ जगहों तक वैज्ञानिक दिशा तय कर रहा था।
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