85 साल के गूर जरबु राम का संयम और त्याग बेमिसाल, खुले आकाश के नीचे गुजारे दिये जीवन के साठ साल
85 साल के गूर जरबु राम का संयम और त्याग बेमिसाल, खुले आकाश के नीचे गुजारे दिये जीवन के साठ साल
जगदीश शर्मा। पांगणा (मंडी)
मंडी ज़िले की पांगणा उपतहसील के अंतर्गत आते छतरी गांव में रहने वाले 85 वर्षीय जरबु राम एक व्यक्ति नहीं, बल्कि देवपरंपरा, लोकआस्था और तपस्वी जीवन के जीवित साक्ष्य माने जाते हैं। बीते लगभग साठ वर्षों से उन्होंने गृहस्थ जीवन की चारदीवारी को त्याग कर खुले आकाश को ही अपना धाम बना लिया है।
उनका विश्वास है कि खुले आकाश में ही उन्हें भगवान शिव और लोक देवताओं की सीधी कृपा प्राप्त होती है। बरसात, बर्फ़बारी, आंधी या प्रचंड ठंड, कभी किसी ऋतु को बाधा नहीं माना। वे एक छाते को ही अपना देवछत्र मानकर खुले में निवास करते रहे। बच्चों के आग्रह पर अब एक तिरपाल का सहारा लेना शुरू किया है, लेकिन उनका तपस्वी जीवन आज भी वैसा ही है।
देवसेवा में रमे साधक का जीवन
जरबु राम क्षेत्र के प्रसिद्ध लोकदेवता गिहनाग बुंडल के देवगण तथा झोर और धूम्री देवियों के गूर हैं। लोक मान्यता के अनुसार झोर वह देवी हैं जो अतिवृष्टि, ओलावृष्टि और बाढ़ जैसी प्राकृतिक शक्तियों से जुड़ी हैं, जबकि धूम्री देवी को तेज़ हवा और तूफ़ानों की अधिष्ठात्री माना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, उनका जीवन देवसेवा में रमे साधक का जीवन है।
देवगणों के गूर के रूप में जरबु राम का जीवन पूर्णतः देवताओं को समर्पित है। उनका कहना है कि अत्यधिक वर्षा, हिमपात या तूफ़ान, ये सब देव संकेत होते हैं और गूर का कर्तव्य है कि वह इन्हें देवकृपा मानकर स्वीकार करे। इसी आस्था के सहारे वे अपने जीवन के 85वें वर्ष को पार कर आज भी साधना पथ पर अग्रसर हैं।
नाग दंश के साथ गृहत्याग
जरबु राम बताते हैं कि लगभग 25 वर्ष की आयु में उन्हें देवता की ओर से गूर बनने का आदेश मिला। जिस दिन उन्होंने देवता के लिए अपने बालों का समर्पण किया, उसी दिन नाग देवता ने सांप का रूप धारण कर उन्हें दंश दिया। वे इस घटना को नाग देवता का प्रत्यक्ष दर्शन मानते हैं। उसी क्षण से उन्होंने अपने घर का त्याग कर देववासी जीवन अपना लिया।
देव गूर बनने पर जो वस्त्र उन्हें देवता की ओर से प्राप्त हुआ, उसे उन्होंने उसी कक्ष में, उसी स्थान पर नाग देवता को अर्पित कर दिया, जहां उन्हें दंश दिया गया था। वे आज भी देवता की ओर से मिलने वाली हर भेंट, चुनरी या चादर वे उसी पावन स्थल पर अर्पित करते हैं। वे वर्षों से ऐसा ही करते आ रहे हैं।
बर्फबारी में नई ऊर्जा का एहसास
जहां सामान्य जन हिमपात में कांप उठते हैं, वहीं जरबु राम के लिए यह तपस्या का सुखद क्षण होता है। वे कहते हैं कि बर्फ़ गिरने पर उन्हें ठंड नहीं, बल्कि ऊर्जा और ऊष्मा का अनुभव होता है। जरबु राम का जीवन आधुनिक सुख-सुविधाओं से परे, देवआस्था, प्रकृति से संतुलन और आत्म-समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
उनका तपस्वी जीवन यह संदेश देता है कि जब मनुष्य स्वयं को देवताओं और प्रकृति के अधीन कर देता है, तब भौतिक साधनों का महत्व समाप्त हो जाता है। छतरी गांव का यह वृद्ध गूर आज भी क्षेत्र की नई पीढ़ी के लिए संयम, त्याग, देवपरंपरा और आध्यात्मिक शक्ति का जीवित प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
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