कांगड़ा के इतिहास की सबसे भावुक गवाहियों में एक पालमपुर के बैलार्ड परिवार की 120 साल पुरानी तस्वीर
कांगड़ा के इतिहास की सबसे भावुक गवाहियों में एक पालमपुर के बैलार्ड परिवार की 120 साल पुरानी तस्वीर
विनोद भावुक। धर्मशाला
पालमपुर के बैलार्ड परिवार की यह तस्वीर इतिहास की सबसे भावुक गवाहियों में से एक है। तस्वीर 5 अप्रैल 1905 को खींची गई थी। ये तस्वीर इंसानी हिम्मत की गवाही देती है, बल्कि याद दिलाती है कि आपदा के बाद भी ज़िंदगी रास्ता ढूंढ ही लेती है।
याद है न, 4 अप्रैल 1905 को कांगड़ा घाटी भूकंप से ऐसी कांपी थी कि हर तरफ तबाही का मंजर था।
पालमपुर में बैलार्ड परिवार चार घंटे तक मलबे के नीचे दबा रहा था। परिवार को लगा कि उनका छोटा बेटा मर चुका है, लेकिन छह घंटे बाद वो फिर सांस लेने लगा।
मलबे में बादल गया था धर्मशाला, कांगड़ा और पालमपुर
4 अप्रैल 1905 को सुबह 6 बजकर 19 मिनट पर आए भयंकर भूकंप ने कुछ ही सेकंड में धर्मशाला, कांगड़ा और पालमपुर को मलबे में बदल दिया। कहते हैं, तब न आसमान की कोई खबर थी, न ज़मीन पर कोई ठिकाना। पेड़ झूल रहे थे, पहाड़ कांप रहे थे और घरों की नींवें धूल में मिल चुकी थीं।
आपदा के बाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 23वीं सिख पायनियर्स यूनिट को राहत कार्य के लिए भेजा गया। राहत दल की कमान कैप्टन विलियम आर्थर हेनरी बर्ड के पास थी। 88 दुर्लभ तस्वीरों का एक पूरा एलबम तैयार किया, जिसमें विनाश, दर्द और मानवीय जिजीविषा के दृश्य कैद हैं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज तबाही
ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में 10 अप्रैल 1905 को भारत के अंडर सेक्रेटरी ने आधिकारिक बयान दिया। उनके ब्यान के मुताबिक धर्मशाला, कांगड़ा और पालमपुर लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। जान-माल का भारी नुकसान हुआ है।
ब्यान में कहा गया था कि संचार बाधित होने के कारण, वास्तविक तबाही का अंदाज़ा अभी नहीं लगाया जा सका है। रिपोर्टों के मुताबिक़ इस भूकंप में लगभग 20,000 लोग मारे गए और हजारों घर, मठ, मंदिर और ब्रिटिश औपनिवेशिक इमारतें खंडहर बन गईं।
नेशनल आर्मी म्यूज़ियम, लंदन में सुरक्षित तस्वीर
बैलार्ड परिवार की यह ऐतिहासिक तस्वीर सहित 1905 के कांगड़ा भूकंप से जुड़ा पूरा एलबम
अब नेशनल आर्मी म्यूज़ियम, लंदन में सुरक्षित है। ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में दर्ज हर कहानी सिर्फ तबाही की नहीं, जिजीविषा की है।
जब आसमान टूट पड़े या फिर हिलकर धरती फट जाए तब भी इंसान का साहस ज़िंदा रह सकता है। 120 साल बीत जाने के बाद भी पालमपुर के बैलार्ड परिवार की यह तस्वीर आज भी पहाड़ की हिम्मत और उम्मीद की प्रतीक बनी हुई है।
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