एक सदी पहले लाहौल के मंदिरों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को उजागर कर गए जर्मनी के हर्मन फ्रांके
एक सदी पहले लाहौल के मंदिरों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को उजागर कर गए जर्मनी के हर्मन फ्रांके
विनोद भावुक। केलंग
यूरोप के मशहूर शोधकर्ता ऑगस्ट हर्मन फ्रांके ने एक सदी पहले बर्फीले रेगिस्तान की भाषा, संस्कृति और इतिहास की गहराई में डूबकर पुरातात्विक और ऐतिहासिक शोध किया। अपनी खोजों में उन्होंने लाहौल के मंदिरों, पत्थर पर लिखे शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों को उजागर किया।
हालांकि फ्रांके 1896 में पहली बार लद्दाख पहुंचे थे और 12 साल तक शोध कार्य किया, लेकिन 1908 में पत्नी की बीमारी के चलते उन्हें परिवार वापस जर्मनी लौटना पड़ा। 1914 में फ्रांके ने अपनी आखिरी भारतीय यात्रा के दौरान अपने लाहौल और लद्दाख के अनूठे शोध को दुनिया के सामने रखा था।
‘मॉडर्न लद्दाख के अध्ययन का जनक
फ्रांके को ‘मॉडर्न लद्दाख के अध्ययन का जनक कहा जाता है। उनकी यात्रा हिमालयी यात्रा सिर्फ मिशनरी कार्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने यहां की भाषाओं, लोकगीतों, ऐतिहासिक ग्रंथों और पुरातात्विक धरोहरों का गहन अध्ययन किया और लदाख के शाही इतिहास का अनुवाद कर इसे अंतरराष्ट्रीय शोध जगत के सामने रखा।
फ्रांके ने 1896 में लद्दाख में अपनी पहली यात्रा की। अगले ही साल उनकी शादी थियोडोरा (‘डोरा’) वाइज से हुई। फ्रांके ने लदाखी, लाहुल की स्थानीय भाषाओं और बोलियों का अध्ययन किया। उन्होंने बाइबल का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया और लोकगीतों पर केसर महाकाव्य भी संकलित किया।
इतिहास प्रेमियों के प्रेरक फ्रांके
फ्रांके की मेहनत और लगन से हिमालय की संस्कृति और इतिहास का ज्ञान विश्व स्तर पर पहुंचा। लाहौल- लद्दाख में उनके शोध और प्रयास आज भी शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। फ्रांके सिर्फ एक शोधकर्ता नहीं, बल्कि हिमालयी ज्ञान और मित्रता का प्रतीक थे।
साल 2020 में फ्रांके की 150 जयंती पर लद्दाख ने अपने शोधकर्ता को याद किया, जिसके चलते यहाँ का ज्ञान पूरी दुनिया तक पहुंचा। उनका पुरातात्विक और ऐतिहासिक शोध यहाँ केसांस्कृतिक इतिहास को जानने का सबसे अहम स्त्रोत माना जाता है। उनके प्रयासों ने विपरीत भौगोलिक परिस्थियों के बाजजूद इतिहास गढा।
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