सदी पहले कांगड़ा का ज्वालामुखी शक्तिपीठ रहा बंगाल के सद्गुरु गोसायजी की अग्नि शक्ति साधना का केंद्र

सदी पहले कांगड़ा का ज्वालामुखी शक्तिपीठ रहा बंगाल के सद्गुरु गोसायजी की अग्नि शक्ति साधना का केंद्र
सदी पहले कांगड़ा का ज्वालामुखी शक्तिपीठ रहा बंगाल के सद्गुरु गोसायजी की अग्नि शक्ति साधना का केंद्र
विनोद भावुक। ज्वालामुखी (कांगड़ा)
बंगाल के नदिया जिले के शांतिपुर (शिकारपुर) में 2 अगस्त 1841 को जन्मे विजयो कृष्ण गोस्वामी, (गोसायजी) ब्रह्म समाज के प्रमुख आचार्य, महिला शिक्षा और बाल-विवाह विरोधी आंदोलन के अग्रदूत रहे। राजा राममोहन राय, देवेंद्रनाथ ठाकुर और केशवचंद्र सेन की परंपरा के गोसायजी ने जब तर्क और विवेक से ईश्वर-प्राप्ति को अधूरा पाया, तब उन्होंने भक्ति और गुरु-कृपा के मार्ग की खोज शुरू की।
यह खोज उन्हें उनके गुरु श्री ब्रह्मानंद परमहंस तक ले गई। गुरु के निर्देश पर ही गोसायजी ने ज्वालामुखी को अपनी साधना-भूमि चुना। ज्वालामुखी शक्तिपीठ स्थल 19वीं सदी के महान संत, समाज-सुधारक और भक्ति योगी गोसायजी की गहन साधना से जुड़ा रहा है। बंगाल के इस असाधारण संत के जीवन में अजपा साधना के माध्यम से निर्णायक मोड़ आया।
ज्वालामुखी: जहां अग्नि और प्राण एक हो गए
ब्रह्मचारी कुलदानंद की प्रसिद्ध कृति ‘श्री श्री सद्गुरु संग’ के अनुसार, गोसायजी को अजपा साधना के दौरान शरीर में तीव्र दाह और असहनीय ऊर्जा का अनुभव होने लगा। गुरु ब्रह्मानंद परमहंस ने उन्हें ज्वालामुखी जाने का आदेश दिया। ज्वालामुखी की प्राकृतिक अग्नि-धाराएं, भूमिगत ऊर्जा और शक्तिपीठ का वातावरण गोसायजी की साधना के लिए अनुकूल सिद्ध हुआ।
माना जाता है कि यहीं उनकी अंतःप्राण शक्ति स्थिर हुई, और उन्होंने अनुभव किया कि शक्ति और भक्ति एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। ज्वालामुखी में साधना के बाद गोसायजी गृहस्थ-संत के रूप में समाज में लौटे। उन्होंने यह संदेश दिया कि गुरु के बिना आत्म-साक्षात्कार संभव नहीं। ढाका, कोलकाता और बंगाल में उनके प्रवचनों में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी उमड़ पड़ते थे।
ज्वालामुखी का ऐतिहासिक महत्व और गोसायजी
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक, ‘सोशियों रिलीजियस रिफॉर्म मूवमेंट इन ब्रिटिश इंडिया’ में केन्नथ डव्ल्यु जोन्स लिखते हैं कि 19वीं सदी में ज्वालामुखी आध्यात्मिक प्रयोगों और साधना का केंद्र भी था। गोसायजी जैसे संतों की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि कांगड़ा केवल सीमांत भूगोल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की मुख्यधारा का हिस्सा रहे हैं।
वर्तमान समय में जब धर्म और आध्यात्म को अक्सर सीमित खांचों में बाँट दिया जाता है, गोसायजी और ज्वालामुखी का संबंध हमें यह याद दिलाता है कि भारत की आत्मा संवाद, साधना और समन्वय में बसती है। ज्वालामुखी की अग्नि-ज्वालाएं केवल देवी की शक्ति नहीं, बल्कि उन संतों की तपस्या की भी साक्षी हैं, जिन्होंने भारत को भीतर से जोड़ने का प्रयास किया।
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Jyoti maurya

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