भूला-बिसरा अध्याय : सिरमौर से दिल्ली के लाल किले तक पहुंचती थी बर्फ, मुगल दरबार में परोसी जाने वाली ठंडी शरबत और कुल्फ़ी का स्रोत थी सिरमौर की पहाड़ियां
भूला-बिसरा अध्याय : सिरमौर से दिल्ली के लाल किले तक पहुंचती थी बर्फ, मुगल दरबार में परोसी जाने वाली ठंडी शरबत और कुल्फ़ी का स्रोत थी सिरमौर की पहाड़ियां
हिमाचल बिजनेस /नाहन
सिरमौर की पहाड़ियों में बनाए गए ‘बरफ़ख़ाने’ अपने दौर की मुग़ल इंजीनियरिंग की एक अनोखी मिसाल थे। इतिहासकारों के अनुसार, मुगल बादशाह शाहजहां ने सिरमौर क्षेत्र में विशेष भूमिगत बरफ़ख़ाने बनवाए, थे, जहां हिमालय से लाई गई बर्फ को पूरे साल सुरक्षित रखा जाता था। यही बर्फ बाद में आगरा और दिल्ली के लाल क़िलों तक पहुंचाई जाती थी।
सिरमौर के बर्फख़ाने फ़ारसी ‘यख़चाल’ तकनीक से प्रेरित थे। मोटी दीवारें, सीमित हवा का प्रवेश और प्राकृतिक इंसुलेशन, यह सब बिना आधुनिक मशीनों के संभव किया गया। भूमिगत संरचनाएं, जिनमें
तापमान नियंत्रित करने की तकनीक, जल-प्रबंधन और शीतलन व्यवस्था मौजूद थी, जिसके चलते बर्फ सुरक्षित रहती थी।
पहाड़ों में संरक्षित शाही ज़रूरत
मुग़ल सम्राट शाहजहां के दौर में स्थापत्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि सुविधा, विलास और तकनीक का प्रतीक था। मुग़ल स्थापत्य सिर्फ़ इमारतों तक सीमित नहीं था। आधुनिक तकनीक की सोच के तहत सिरमौर की पहाड़ियों में बनाए गए बर्फख़ाने पहाड़ों में शाही ज़रूरत बर्फ को संरक्षित रखने की इंजीनियरिंग की अनूठी तकनीक थी।
दिल्ली की तपती गर्मी के दौरान मुग़ल दरबार में जो ठंडी शरबत और कुल्फ़ी परोसी जाती थी, उनकी ठंडक का स्रोत सिरमौर की पहाड़ियों में था। मुगलकाल में सिरमौर सिर्फ पहाड़ी रियासत नहीं, बल्कि मुग़ल साम्राज्य की जीवनशैली का मौन सहभागी थी। सिरमौर जैसी पहाड़ी रियासत उस दौर में मुग़लों के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण थी।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में बर्फखानों का उल्लेख
सिरमौर की भौगोलिक स्थिति ने मुग़लों को प्राकृतिक संसाधन, ठंडी जलवायु, सुरक्षित भंडारण स्थल जैसी सुविधाएं दीं, जो मैदानों में संभव नहीं थीं। सिरमौर में मुग़ल स्थापत्य के विशाल स्मारक नहीं दिखते, लेकिन बर्फख़ानों और मुग़लकालीन आपूर्ति मार्गों के उल्लेख ‘तूज़ुक-ए-जहांगिरी’ सहित कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में आज भी मिलते हैं।
मुग़ल स्थापत्य को अगर गुंबदों तक सीमित रखा जाए, तो सिरमौर के योगदान को समझना अधूरा रहेगा। कभी शाही मुगल ऐशो-आराम की ज़रूरतों से गहराई से जुड़ा यह इलाका बताता है कि मुग़ल वास्तुकला केवल दिखने की चीज़ नहीं थी, बल्कि जीने की कला थी। कम लोग जानते हैं कि सिरमौर मुग़ल स्थापत्य और शाही जीवनशैली से अप्रत्यक्ष, लेकिन बेहद अहम रूप से जुड़ा था।
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