चंबा की गोद में गढ़ा गया एक महान विद्वान, क्षितिमोहन सेन ने शांतिनिकेतन में पूरे किए टैगोर के अरमान

चंबा की गोद में गढ़ा गया एक महान विद्वान, क्षितिमोहन सेन ने शांतिनिकेतन में पूरे किए टैगोर के अरमान
चंबा की गोद में गढ़ा गया एक महान विद्वान, क्षितिमोहन सेन ने शांतिनिकेतन में पूरे किए टैगोर के अरमान
विनोद भावुक। चंबा
हिमाचल प्रदेश का चंबा केवल मंदिरों, पहाड़ों और नदियों का ही शहर नहीं है, यह उन विचारों की भूमि भी है, जहां से आधुनिक भारत की बौद्धिक चेतना को नई दिशा मिली। कम ही लोग जानते हैं कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के निकटतम बौद्धिक सहयोगी और अमर्त्य सेन के नाना क्षितिमोहन सेन के जीवन का एक निर्णायक अध्याय चंबा रियासत से जुड़ा है।
30 नवंबर 1880 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्मे क्षितिमोहन सेन संस्कृत के गहरे अध्येता थे। काशी के क्वीन्स कॉलेज, बनारस से एम.ए. करने के बाद उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत किसी विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि चंबा रियासत के शिक्षा विभाग से की और अपने अध्यापन से कई प्रतिभाएं गढ़ी।
चंबा ने खोले साधना के द्वार
20वीं सदी की शुरुआत में चंबा एक दूरस्थ पहाड़ी रियासत थी, लेकिन चंबा की लोक-संस्कृति, साधना परंपरा और हिमालयी एकांत ने इस युवा विद्वान क्षितिमोहन सेन को भीतर तक प्रभावित किया। यहीं रहते हुए क्षितिमोहन सेन ने पहली बार भारतीय संत परंपरा, लोकधर्म और साधना की जीवंत धारा को नज़दीक से देखा।
चंबा में रहते हुए क्षितिमोहन सेन ने महसूस किया कि भारत की असली आत्मा विश्वविद्यालयों में नहीं, बल्कि संतों, फकीरों, लोकगायकों और साधकों में बसती है। यही अनुभव आगे चलकर उनकी प्रसिद्ध कृतियों का आधार बना। कबीर, दादू, भारतीय मध्ययुग की साधना धारा और भारतीय हिंदू-मुस्लिम संयुक्त साधना जैसी पुस्तकें इसी दृष्टि की देन हैं।
चंबा से शांतिनिकेतन का सफर
कहा जाता है कि चंबा की शांत घाटियों में क्षितिमोहन सेन ने पहली बार यह समझा कि धर्म दीवार नहीं, बल्कि संवाद है। 1908 में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें शांतिनिकेतन बुलाया, तब क्षितिमोहन सेन केवल एक संस्कृत विद्वान नहीं थे, वे चंबा की मिट्टी से सीखी हुई लोक चेतना और भारतीयता की व्यापक समझ लेकर गए थे।
शांतिनिकेतन में उन्होंने ब्रह्मचर्याश्रम से लेकर विद्या भवन के आचार्य और बाद में विश्वभारती के कार्यवाहक कुलपति तक की भूमिका निभाई। 1952 में उन्हें विश्वभारती का पहला ‘देशिकोट्टम’ सम्मान मिला। क्षितिमोहन सेन ही नहीं, उनकी वैचारिक विरासत भी आगे बढ़ी। उनके नाती अमर्त्य सेन नोबेल पुरस्कार विजेता बने।
हिमालय की चुपचाप गढ़ी गई विरासत
चंबा ने क्षितिमोहन सेन को केवल नौकरी ही नहीं दी, उन्हें एक ऐसी दृष्टि दी, जिससे भारत को समझा जा सका, जिससे संतों को पढ़ा गया और जिससे धर्म को इंसानियत से जोड़ा गया। विश्वभर्ती यूनिवर्सिटी ने क्षितिमोहन सेन की जीवनी प्रकाशित की है, जिसमें उनके चंबा प्रवास का जिक्र एक शिक्षक से चिंतक का सफरनामा है।
आज भी चंबा के पहाड़ों में सिर्फ़ प्रकृति ही नहीं, भारतीय बौद्धिक इतिहास की एक मौन लेकिन मजबूत नींव भी दिखाई देती है। क्षितिमोहन सेन के चिंतन में मानवीयता, संवाद और बहुलता की जो दृष्टि दिखती है, उसकी जड़ें कहीं न कहीं चंबा में बिताए गए उन वर्षों तक जाती हैं। क्षितिमोहन सेन के कार्य इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध हैं।
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Jyoti maurya

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