सौ साल पहले किन्नौर, लाहौल और चंबा से होते हुये पैदल लहासा पहुंच गई थी फ्रांस की डेविड नील

सौ साल पहले किन्नौर, लाहौल और चंबा से होते हुये पैदल लहासा पहुंच गई थी फ्रांस की डेविड नील
सौ साल पहले किन्नौर, लाहौल और चंबा से होते हुये पैदल लहासा पहुंच गई थी फ्रांस की डेविड नील
विनोद भावुक। हिमाचल बिजनेस
सौ साल पहले पहली विदेशी शोधयात्री फ्रांस की अलेक्ज़ांड्रा डेविड नील ने किन्नौर, लाहौल और चंबा से होते हुये पैदल लहासा पहुंचने का कारनामा कर दिखाया था। उस समय विदेशियों के लिए ल्हासा पहुंचना लगभग असंभव था, पर साल 1924 में उन्होंने एक बौद्ध महिला भिक्षुणी का रूप धारण किया और यानी तिब्बत की राजधानी ल्हासा में प्रवेश किया।
फ्रांस में जन्मी अलेक्ज़ांड्रा डेविड नील बचपन से ही अलग सोच रखती थीं। उन्हें मंदिरों, संगीत और रहस्यमयी भारत की कहानियां अपनी ओर खींचती थीं। साल 1911 में वह भारत पहुंची। उन्होंने अगले कुछ साल सिक्किम, लाहौल, किन्नौर और चंबा की सीमाओं से होते हुए हिमालय की गोद में बिताए तथा हिमालय के रहस्यों को अपनी आँखों से देखा और समझा।
बर्फ़, हवा और रहस्य के बीच विदेशी औरत
हिमालय को करीब से जानने के लिए ऊँची घाटियों में बर्फ़, हवा और रहस्य के बीच एक विदेशी औरत अकेली चल रही थी। उन्होंने देखा पहाड़ों की यह धरती केवल सुंदर नहीं, ज्ञान और साधना का केंद्र है। यहां देवी-देवता और बुद्ध दोनों एक ही आकाश में विराजमान हैं। उन्होंने भारत के गांवों में रहकर लोककथाएं लिखीं, साधुओं से दर्शन सीखे और हिमालय के रास्तों से तिब्बत की ओर निकल पड़ीं।
अलेक्ज़ांड्रा डेविड नील ने अपनी हिमालयी यात्रा पर किताबें लिखीं हैं। उनकी किताबें ‘माय जर्नी टू ल्हासा’ और ‘मैजिक एंड मिस्ट्री इन तिब्बत’ आज दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। उन्होंने लिखा है, हिमालय की यात्रा केवल पहाड़ की यात्रा नहीं, यह आत्मा की यात्रा है। उनकी पुस्तकें हिमालय को जानने के जिज्ञासुओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं।
पश्चिम की दुनिया का पश्चिमी हिमालय से संवाद
अलेक्ज़ांड्रा डेविड-नील को एक साहसी शोधयात्री के रूप में याद किया जाता है, जिसने पश्चिम की दुनिया को पश्चिमी हिमालय और तिब्बत की आत्मा से मिलवाया। एक सदी पहले वह केवल पश्चिमी हिमालय की यात्रा नहीं कर रही थीं, वह आत्मा के सफ़र पर थीं। उनकी ज्ञान की खोज ने उन्हें हिन्दू और बोध धर्म और दर्शन से परिचित करवाया।
उनकी राह आज भी इन पर्वतों की हवा में महसूस होती है। जब भी कोई शोधार्थी हिमालय की तरफ़ बढ़ता है, अलेक्ज़ांड्रा डेविड-नील उसकी प्रेरणा का हिस्सा बन जाती है। फ्रांस के पेरिस शहर में उनके नाम की सड़क और स्टेडियम उनके साहस को सही अर्थ में याद करने वाले स्मारक हैं।
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Jyoti maurya

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