सौ साल पहले कुल्लू और लाहौल, स्पीति के पक्षियों का अध्ययन कर गया अमेरिकी वैज्ञानिक वॉल्टर कोएल्ज़, जुटाये हिमालयी परिंदों के तीस हजार नमूने

सौ साल पहले कुल्लू और लाहौल, स्पीति के पक्षियों का अध्ययन कर गया अमेरिकी वैज्ञानिक वॉल्टर कोएल्ज़, जुटाये हिमालयी परिंदों के तीस हजार नमूने
सौ साल पहले कुल्लू और लाहौल, स्पीति के पक्षियों का अध्ययन कर गया अमेरिकी वैज्ञानिक वॉल्टर कोएल्ज़, जुटाये हिमालयी परिंदों के तीस हजार नमूने
विनोद भावुक। नग्गर
कुल्लू का नग्गर क्षेत्र 20वीं सदी के आरंभ में वैज्ञानिक खोजों का एक अहम केंद्र रहा है। इसकी बड़ी विदेशी वैज्ञानिक डॉ. वॉल्टर नॉर्मन कोएल्ज़ ने यहां जैव-विविधता को लेकर अहम शोध किया, जिसके चलते उनका नाम आज भी हिमालयी जैव-विविधता के अध्येताओं में सम्मान से लिया जाता है। जर्नल ऑफ द बॉम्बे नुचुरल हिस्ट्री सोसायटी में नगगर को लेकर उनके कई नोट्स उपलब्ध हैं।
मई 1930 में, अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय से जुड़े युवा प्राणी विज्ञानी वॉल्टर कोएल्ज़ कुल्लू घाटी के नग्गर पहुंचे। यह वही दौर था जब रूसी कलाकार और दार्शनिक निकोलस रोरिख ने यहां हिमालयन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की थी। कोएल्ज़ ने इसी संस्थान से जुड़कर हिमालय की वनस्पति और जीव-जंतुओं पर शोध किया।
पक्षियों के तीस हाजर नमूने जुटाये
वॉल्टर कोएल्ज़ के लिए नग्गर यह उनकी हिमालयी खोज-यात्रा की शुरुआत थी। नग्गर में ही कोएल्ज़ की मुलाकात स्थानीय विद्वान और प्रकृति-प्रेमी ठाकुर रूप चंद से हुई। यह मुलाकात आगे चलकर 30 वर्षों की साझेदारी में बदल गई। दोनों ने मिलकर कुल्लू, लाहौल, स्पीति और ज़ांस्कर में पक्षियों का अध्ययन किया और हिमालयी पौधों का विशाल संग्रह तैयार किया।
कोएल्ज़ ने नग्गर को आधार बनाकर हिमालय के दूर-दराज़ इलाकों में यात्राएँ कीं। उनके शोध का दायरा बेहद व्यापक था। उन्होंने स्थानीय ज्ञान को वैश्विक विज्ञान से जोड़ा। उनके जुटाये लगभग 30,000 पक्षी नमूने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगिन के म्यूजियम ऑफ जूलोजी आर्काइव्स में संग्रहित किए गए हैं। लाहौल, स्पीति और कुल्लू पर लिखे गए शोध-पत्र आज भी वैज्ञानिक संदर्भ माने जाते हैं।
कला, अध्यात्म और विज्ञान का त्रिकोण
कोएल्ज़ का 1937 में प्रकाशित प्रसिद्ध शोध-पत्र ‘नोट्स ऑन द बर्ड्स ऑफ स्पीति उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाये जाने वाले परिंदों की दुनिया दिखाता है। नग्गर रोरिख की कला और अध्यात्म का केंद्र था, लेकिन कोएल्ज़ जैसे वैज्ञानिकों की वजह से यह स्थान आधुनिक वैज्ञानिक शोध का केंद्र बना। नग्गर भारत के उन गिने-चुने हिमालयी कस्बों में है, जहाँ कला, अध्यात्म और विज्ञान एक साथ पनपे।
कोएल्ज़ द्वारा बताई गईं कई पक्षी-उपप्रजातियाँ आज मान्य नहीं मानी जातीं, इसके बावजूद, उनके कार्य का ऐतिहासिक महत्व कम नहीं होता। उन्होंने हिमालयी जैव-विविधता का पहला व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण किया, कई दुर्गम क्षेत्रों को विज्ञान की दुनिया से जोड़ा और नग्गर को अंतरराष्ट्रीय शोध मानचित्र पर स्थापित कर वैश्विक वैज्ञानिकों का प्रयोगशाला-क्षेत्र था।
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Jyoti maurya

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