पहाड़ों में आत्मनिर्भरता की मिसाल: ‘किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र’ से सजी संस्कृति, रोज़गार और स्वाभिमान
पहाड़ों में आत्मनिर्भरता की मिसाल: ‘किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र’ से सजी संस्कृति, रोज़गार और स्वाभिमान
विनोद भावुक। शिमला
ऊँचे पहाड़, कठिन रास्ते और सीमित संसाधन, किन्नौर की यही पहचान रही है। लेकिन इन्हीं पहाड़ियों से निकली एक महिला ने यह साबित कर दिया कि अगर भरोसा अपनी जड़ों पर हो, तो भविष्य यहीं बनता है। यह कहानी है दीप माला नेगी की, जिन्होंने मुनाफ़े से पहले संस्कृति संरक्षण और स्थायी आजीविका को अपना लक्ष्य बनाया।
किन्नौर के जनजातीय अंचल से ताल्लुक रखने वाली दीप माला नेगी ने ‘किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र’ की शुरुआत बेहद सीमित साधनों के साथ की। उनका सपना सरल लेकिन दूरदर्शी था. अपने क्षेत्र की अनोखी पहचान को बचाना और उसे टिकाऊ रोज़गार से जोड़ना। उन्होंने स्थानीय किन्नौरी सामग्री की शुद्धता और गुणवत्ता पर भरोसा किया और उसी के सहारे “टेस्ट ऑफ़ किन्नौर” को दुनिया तक पहुंचाने की ठानी।
इस पहल की खासियत इसकी जड़ों से जुड़ी सोच है। पारंपरिक अचार और चटनियों से लेकर दुर्लभ प्राकृतिक तेलों और स्थानीय एथनिक परिधानों तक, किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र ने क्षेत्र की विरासत को आधुनिक बाज़ार से जोड़ा। हर उत्पाद में पहाड़ों की खुशबू, मेहनत की सच्चाई और संस्कृति का सम्मान झलकता है।
दीप माला नेगी कहती हैं, मेरी यात्रा आत्मनिर्भरता की गवाही है। अगर आप अपनी स्थानीय क्षमताओं पर विश्वास रखें, तो भविष्य यहीं, इन्हीं पहाड़ियों में बन सकता है। आज यह पहल केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि युवा रोज़गार और महिला उद्यमिता का मज़बूत मंच बन चुकी है, जहां नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं का मूल्य समझ आता है।
छोटी-सी शुरुआत से निकला यह प्रयास आज समुदाय आधारित रोज़गार का सशक्त उदाहरण है। किन्नौर माउंटेन ट्रेज़र ने दिखा दिया है कि संस्कृति संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं, बस दिशा सही होनी चाहिए।
यह कहानी पहाड़ों की है, पर संदेश देशभर के लिए हैस्था, नीय हुनर में ही वैश्विक भविष्य छिपा है।
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