लोकतंत्र की जड़ में खड़ा एक नाम, जसौर के चौधरी सालीग्राम, हम करेंगे उनका सम्मान
लोकतंत्र की जड़ में खड़ा एक नाम, जसौर के चौधरी सालीग्राम, हम करेंगे उनका सम्मान
जग्गू नोहरिया। जसौर (नगरोटा बगवां)
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे समय में लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन सबसे मज़बूत इकाई ‘पंचायत’ की असली ताक़त को समझना ज़रूरी हो जाता है। यह ताक़त होती है चरित्र, ईमानदारी और जनसेवा में। ऐसे ही एक नाम थे चौधरी सालीग्राम, जो दो बार जसौर पंचायत के प्रधान रहे और जिनकी ईमानदारी के किस्से आज भी गांव- गांव में मिसाल के तौर पर सुनाए जाते हैं।
22 जनवरी 2008, 85 वर्ष की उम्र में चौधरी सालीग्राम इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनकी नेक नीयत, उनकी ईमानदारी और उनकी जनसेवा आज भी पंचायत की राजनीति के लिए कसौटी बनी हुई है। वो कहानी, जो किताबों में होनी चाहिए, चौधरी सालीग्राम की ईमानदारी की एक कहानी आज भी लोगों की ज़ुबान पर है।
कारोबार में घाटा, किसानों का कर्जा
चौधरी सालीग्राम पेशे से आलू के व्यापारी थे। कारोबार अच्छा चल रहा था, लेकिन घाटा हुआ और कर्ज़ में डूब गए। यहीं से उनकी असली परीक्षा शुरू हुई। उन्होंने कोई शॉर्टकट नहीं अपनाया, न भागे,न बहाने बनाए। जिन-जिन किसानों से उन्होंने आलू खरीदे थे, घर-घर जाकर हाथ जोड़कर निवेदन किया कि पैसे में देरी हो सकती है,लेकिन आपकी पाई-पाई जरूर चुकाई जाएगी।
उन्होंने आत्मसम्मान से समझौता नहीं। हालात ने झुकाया, तो हुनर सीख लिया। ज़िंदगी ने जब रास्ते बंद किए, तो चौधरी सालीग्राम ने नया रास्ता खुद बनाया। उन्होंने खुद हजाम (नाई) का काम सीखा। बड़ा बेटा पिता के काम में हाथ बंटाने लगा। उन्होंने पत्थर तोड़े, रौंखर में लकड़ी का टाल लगाया। एक-एक कर सभी किसानों का कर्ज़ चुका दिया।
व्यापार में न्याय और नैतिकता
एक बार एक किसान ने उन्हें बेहतरीन गुणवत्ता के तीन बोरी आलू बेचे। जब वे दिल्ली की सब्ज़ी मंडी पहुँचे, तो संयोग से उन्हीं तीन बोरियों को खोलकर दाम तय हुआ और उन्हें उम्मीद से कहीं ज़्यादा रेट मिला। क्या किया सालीग्राम ने? उन्होंने मुनाफा जेब में नहीं रखा। वे वापस गाँव लौटे, उस किसान के घर गए और दिल्ली मंडी में मिले पूरे रेट के हिसाब से भुगतान किया।
क्योंकि उनके लिए व्यापार से पहले न्याय और नैतिकता थी। आज उनके बेटे नौकरियों और कारोबार में सफल हैं, लेकिन सबसे बड़ी विरासत उन्हें पिता का चरित्र मिला है। पिता से मिली सीख ने बेटों को खरे- बुरे वक्त में मेहनत के दम पर आगे बढ्ने का रास्ता दिखाया, जिस पर चल कर वे सामाजिक और कारोबारी जीवन में खुशहाल हैं।
सड़क के लिए लोगों से फरियाद, हम रखेंगे उनको याद
प्रधान रहते हुए चौधरी सालीग्राम ने जसौर से चोउ तक सड़क के लिए घर-घर जाकर लोगों को समझाया और मनाया। उन्होंने बार- बार लोगों से जमीन देने का अनुरोध किया और समझाया कि यह सड़क ग्रामीण विकास में भाग्यरेखा साबित होगी। उनके अथक प्रयासों से सड़क बनी, जो आज रोंखर–जसौर के लिए शॉर्टकट सड़क है और सैकड़ों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी आसान बना रही है।
पंचायत चुनाव सिर्फ़ वोट देने का नाम नहीं है। यह तय करने का मौका है कि क्या हमें सत्ता चाहिए या सेवा? क्या हमें नाम चाहिए या नीयत? चौधरी सालीग्राम जैसे लोग बताते हैं कि लोकतंत्र ऊपर से नहीं, नीचे से मज़बूत होता है। जल्द ही अवाम संस्था इस सड़क का नाम चौधरी शालीग्राम मार्ग रख इस पुण्य आत्मा के काम का सम्मान करेगी।
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