इतिहास में दर्ज तस्वीर : 24 जून 1939 की सुबह, हाथों से खींचे जाने वाले रिक्शे पर सवार ब्रिटिश भारत के वाइसराय लॉर्ड लिंलिथगो और लेडी लिंलिथगो

इतिहास में दर्ज तस्वीर : 24 जून 1939 की सुबह, हाथों से खींचे जाने वाले रिक्शे पर सवार ब्रिटिश भारत के वाइसराय लॉर्ड लिंलिथगो और लेडी लिंलिथगो
इतिहास में दर्ज तस्वीर : 24 जून 1939 की सुबह, हाथों से खींचे जाने वाले रिक्शे पर सवार ब्रिटिश भारत के वाइसराय लॉर्ड लिंलिथगो और लेडी लिंलिथगो
हिमाचल बिजनेस। शिमला
शिमला की ठंडी वादियों में 24 जून 1939 की सुबह एक दृश्य दर्ज हुआ, जो आज भी इतिहास के पन्नों में मुस्कुराता है। ब्रिटिश भारत के वाइसराय लॉर्ड लिंलिथगो और उनकी पत्नी लेडी लिंलिथगो, पहाड़ी गलियों में रिक्शा की सवारी करते हुए पैस्ट्यूर सेंटर पहुँचे, जहाँ उस समय दुनिया के सबसे बड़े टीबी प्रशिक्षण केंद्र की नींव रखी जा रही थी।
यह वह दौर था जब शिमला ब्रिटिश शासन की ग्रीष्म राजधानी कहलाता था। दिल्ली से तमाम दफ़्तर, फ़ाइलें और फ़रमान गर्मियों में शिमला के ठिकानों में पहुँच जाया करते थे। लेकिन, शिमला की सँकरी सड़कों पर मोटर गाड़ियों की मनाही थी। चाहे वाइसराय ही क्यों न हों, राज की ताक़त को भी मानव हाथों से खींचे जाने वाले रिक्शे का सहारा लेना पड़ता था।
शिमला की गलियों में रिक्शे का सफर
यह दृश्य उस समय के भारत का विरोधाभास दर्शाता है, जहाँ शासन के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी एक साधारण पहाड़ी रिक्शा पर निर्भर था। टीबी (तपेदिक) उस दौर में जानलेवा बीमारी थी। ब्रिटिश सरकार भारत में इस रोग को रोकने के लिए आधुनिक प्रयोगशालाओं और प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना कर रही थी। लॉर्ड लिंलिथगो की यह यात्रा उसी संकल्प की प्रतीक थी। जब सत्ता और स्वास्थ्य साथ-साथ शिमला की ढलानों पर चढ़े थे।
दिलचस्प बात यह है कि रिक्शा की शुरुआत जापान में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुई थी। धीरे-धीरे यह एशियाई देशों में आम परिवहन बन गया और फिर वही खींचा जाने वाला रिक्शा शिमला की गलियों में ब्रिटिश साम्राज्य के वायसराय की सवारी बना। लॉर्ड लिंलिथगो 1936 से 1943 तक भारत के वाइसराय रहे। उन्होंने भारत के लिए Government of India Act, 1935 तैयार करने वाली समिति की अध्यक्षता की थी।
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Jyoti maurya

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