विश्व विरासत कालका- शिमला रेल की पटरियों पर खड़ा इतिहास, पहाड़ों में इंजीनियरिंग का चमत्कार ब्रिज नंबर 541
विश्व विरासत कालका- शिमला रेल की पटरियों पर खड़ा इतिहास, पहाड़ों में इंजीनियरिंग का चमत्कार ब्रिज नंबर 541
विनोद भावुक। शिमला
शिमला की पहाड़ियों में जब ट्रेन सुरंगों से निकलकर खुले आसमान के नीचे आती है, तो कुछ पल ऐसे होते हैं जब समय मानो ठहर जाता है। ऐसा ही एक पल मिलता है कालका- शिमला रेल मार्ग पर कनोह रेलवे स्टेशन के पास बने ऐतिहासिक ब्रिज नंबर 541 पर, जो सिर्फ़ एक पुल नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे की इंजीनियरिंग विरासत का जीवंत उदाहरण है।
ब्रिज नंबर 541 कनोह रेलवे स्टेशन से महज़ 50 मीटर की दूरी पर स्थित है। कनोह एक छोटा सा गांव है, जहां आज भी कुछ परिवार रहते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस गांव तक आज भी सड़क नहीं पहुंची है। यहां के लोग अपनी रोज़ी-रोटी, आवाजाही और ज़रूरतों के लिए पूरी तरह रेलवे स्टेशन पर निर्भर हैं। ऐसे में यह पुल सिर्फ़ ट्रेन का रास्ता नहीं, बल्कि गांव की जीवनरेखा है।
1898 में बना, आज भी सबसे ऊंचा
ब्रिज नंबर 541 का निर्माण 1898 में किया गया था। यह आज भी भारतीय रेलवे द्वारा बनाया गया सबसे ऊंचा आर्च ब्रिज माना जाता है। उस दौर में जब आधुनिक मशीनें नहीं थीं, तब इस पुल को ईंट और पत्थर से तैयार किया गया, जो उस समय की कारीगरी और तकनीकी समझ को दर्शाता है।
आंकड़े इस पल को खास बनाते हैं। इसकी कुल लंबाई 52.90 मीटर, ऊंचाई 23 मीटर, कुल आर्च (मेहराब): 34, चार मंज़िला आर्च गैलरी और 48 डिग्री का रिवर्स कर्व, जो इसे तकनीकी रूप से और भी चुनौतीपूर्ण बनाता है। कालका- शिमला रेल मार्ग पर यह पुल चार मंज़िला आर्च गैलरी वाला सबसे ऊंचा पुल है।
यूनेस्को की नज़र में विश्व विरासत
ब्रिज नंबर 541 सिर्फ़ यात्रियों और इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि यूनेस्को टीम के लिए भी खास रहा है। यूनेस्को की टीम ने कालका- शिमला रेलवे को विश्व विरासत घोषित करने से पहले इस पुल के साथ-साथ तारा देवी, बड़ोग सुरंग और कंडाघाट स्टेशन जैसे स्थलों का दौरा किया था, जो इस पूरे रेल मार्ग की वैश्विक ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाता है।
आज जब शिमला की टॉय ट्रेन ब्रिज नंबर 541से गुजरती है, तो उसके नीचे सिर्फ़ घाटी नहीं होती, बल्कि 127 साल पहले की मेहनत, धैर्य और तकनीकी समझ बहती है। कालका- शिमला रेल का ब्रिज नंबर 541 हमें याद दिलाता है कि हिमालय में रेलवे बिछाना सिर्फ़ निर्माण नहीं था, बल्कि इंसानी हौसले की जीत थी।
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