कम्पोज़िट पोर्ट्रेट’ के तौर पर दुनिया भर में मशहूर हुआ 1905 में सुबाथू से इंग्लैंड भेजा गया पोस्टकार्ड
कम्पोज़िट पोर्ट्रेट’ के तौर पर दुनिया भर में मशहूर हुआ 1905 में सुबाथू से इंग्लैंड भेजा गया पोस्टकार्ड
हिमाचल बिजनेस। सोलन
ब्रिटिश राज के दौरान जुलाई 1905 में सुबाथु कैंटोनमेंट से इंग्लैंड भेजा गया एक पोस्टकार्ड इतिहास और कला प्रेमियों के लिए खज़ाना है। 13.80 x 9.00 सेंटीमीटर का यह कोलोटाइप पोस्टकार्ड उस दौर की छपाई तकनीक, सामाजिक जीवन और औपनिवेशिक भारत की झलक को एक साथ समेटे हुए है। यह पोस्टकार्ड पारसी समुदाय के एक आकर्षक ‘कम्पोज़िट पोर्ट्रेट’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ था।
इस कोलोटाइप पोस्टकार्ड को उस समय की नामी फोटोग्राफी और प्रिंटिंग कंपनी क्लिफ़्टन एंड कंपनी ने तैयार किया था। इसका मूल एल्ब्यूमेन प्रिंट संभवतः 1890 के दशक के अंतिम वर्षों का था, जिसे बाद में अलग-अलग प्रकाशकों ने पुनः प्रकाशित किया, लेकिन 1905 में छपा यह रंगीन संस्करण अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है।
कोलोटाइप: जब तस्वीरें कला बन जाती थीं
आज डिजिटल प्रिंटिंग आम है, लेकिन 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में कोलोटाइप तकनीक उच्च गुणवत्ता वाली फोटो-प्रतिलिपि के लिए जानी जाती थी। इसमें महीन टोन और गहराई दिखाई देती थी। छवि लगभग असली फोटोग्राफ जैसी लगती थी और रंगीन संस्करण बेहद सीमित संख्या में छपते थे। यही वजह है कि 121 साल पुराना पोस्टकार्ड संग्रहकर्ताओं के लिए खास महत्व रखता है।
यह कम्पोज़िट पोर्ट्रेट पारसी समाज की पहचान, पहनावे और उस दौर की सामाजिक गरिमा को दर्शाता है। पारसी समुदाय 19वीं सदी के भारत में व्यापार, शिक्षा और सामाजिक सुधारों में अग्रणी भूमिका निभा रहा था। ऐसे पोस्टकार्ड न केवल स्मृति-चिह्न थे, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी बने।
पोस्टकार्ड के पीछे का हिस्सा अनडिवाइडेड बैक
1905 में यह पोस्टकार्ड सुबाथू से इंग्लैंड भेजा गया। यह तथ्य इसे और भी रोचक बना देता है। ब्रिटिश काल में सुबाथू एक महत्वपूर्ण सैन्य छावनी थी। उस समय सोलन और शिमला की पहाड़ियों में ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों का ठिकाना था। संभवतः किसी अधिकारी या यात्री ने इस अनोखे पारसी पोर्ट्रेट को यादगार के रूप में खरीदा और अपने घर इंग्लैंड भेज दिया।
यह केवल एक डाक सामग्री नहीं थी। यह एक कहानी थी, जो हिमालय की गोद से यूरोप तक पहुँची। पोस्टकार्ड के पीछे का हिस्सा अनडिवाइडेड बैक था, जिसका मतलब कि पीछे का पूरा भाग केवल पते के लिए होता था। संदेश सामने की तस्वीर के ऊपर लिखा जाता था। 1902 के बाद डाक नियमों में बदलाव आया और डिवाइडेड बैक प्रचलन में आया, जिससे पीछे संदेश और पता दोनों लिखे जा सकते थे।
12। साल पुरानी जीवंत यात्रा का साक्षी
यह कार्ड उस संक्रमणकालीन दौर का प्रतिनिधि माना जा सकता है। संग्रहकर्ताओं के लिए यह इसलिए खास है, क्योंकि यह 1890 के दशक की मूल छवि पर आधारित और दुर्लभ रंगीन संस्करण है। यह सवा सदी पुराना औपनिवेशिक भारत और पारसी समुदाय का सांस्कृतिक दस्तावेज है। यह पोस्टकार्ड एक विंटेज पोस्टकार्ड है।
एक छोटा-सा पोस्टकार्ड हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल युद्धों और राजाओं में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की वस्तुओं में भी छिपा होता है। यह कार्ड उस दौर की कला, तकनीक, समाज और संचार व्यवस्था का जीवंत प्रमाण है। आज अगर यह पोस्टकार्ड किसी संग्रहालय या निजी संग्रह में सुरक्षित है, तो वह केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि 12। साल पुरानी एक जीवंत यात्रा का साक्षी है।
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