करघे पर क्रांति: फादर डॉटर कोलैब का सबसे खूबसूरत कलेक्शन, शिमला के ग्रैंड शो की स्टेटमेंट पीस बनकर चमकी मंडी के कृष्णा वूल की शॉलें
करघे पर क्रांति: फादर डॉटर कोलैब का सबसे खूबसूरत कलेक्शन, शिमला के ग्रैंड शो की स्टेटमेंट पीस बनकर चमकी मंडी के कृष्णा वूल की शॉलें
हिमाचल बिजनेस । शिमला
शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर शनिवार को हिमाचल की शॉलें गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड रच रही थीं, तब यह सिर्फ़ ऊन और डिज़ाइन का जश्न नहीं था। यह पीढ़ियों की मेहनत, करघों की तपस्या और स्लो फैशन के आत्मविश्वास की कैटवॉक थी। इसी ऐतिहासिक पल की फ्रंट रो में बैठे थे ओम प्रकाश मल्होत्रा। 2012 के शिल्प गुरु पुरस्कार से सम्मानित कारीगर और उनकी बनाई शालें इस ग्रैंड शो की स्टेटमेंट पीस बनकर चमक रही थीं। 1.5 लाख रुपये की एक शाल दर्शकों के लिए नहीं, बल्कि विरासत के लिए पहनी गई थी।
इस रैंप की असली डिज़ाइनर हैं उनकी बेटी अंशुल मल्होत्रा। मंडी की पहाड़ियों में पली बढ़ी अंशुल आज हिमाचल प्रदेश के हथकरघा को लोकल लेबल से ग्लोबल ब्रांड की ओर स्टाइल कर रही हैं। उनके जीवन की यह कहानी कई विश्वसनीय मंचों पर भी दर्ज है, जहां सामाजिक उद्यमिता, महिला नेतृत्व और टिकाऊ फैशन की मिसालें रखी जाती हैं।
बचपन की स्केचबुक से ब्रांड ब्लूप्रिंट तक
अंशुल का पहला फैशन स्कूल कोई इंस्टीट्यूट नहीं, बल्कि गांव-गांव घूमते उनके पिता थे, जो इंजीनियर की सरकारी नौकरी छोड़कर हथकरघा संरक्षण में जुट गए। जब समाज ने कहा कि बेटियां बिज़नेस नहीं संभालतीं, तब अंशुल ने उस धारणा को ही आउटडेटेड ट्रेंड घोषित कर दिया। टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ उन्होंने तय किया कि पारिवारिक विरासत की बागडोर अब फीमेल लीडरशिप के हाथ में होगी।
कृष्णा वूल: जहां करघा चलता है, ज़िंदगी संवरती है
2005 में कृष्णा वूल से जुड़कर अंशुल ने ब्रांड को नया सिलुएट दिया। आज उनके साथ 200 से अधिक बुनकर काम करते हैं, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं। पहाड़ी इलाकों में रहने वाली इन महिलाओं को अंशुल ने घर पर ही करघे उपलब्ध कराए, ताकि रोज़गार उनके दरवाज़े तक पहुंचे।
हर 15–20 दिन में मेहनताना, सालों की ट्रेनिंग मुफ्त, और सम्मानजनक पहचान। यह मॉडल एथिकल फैशन का क्लासिक उदाहरण है। अब तक 2,200 से अधिक डिज़ाइन तैयार हो चुके हैं। हर डिज़ाइन एक कहानी, हर पैटर्न एक पहचान है।
ऑर्गेनिक पैलेट, नेचुरल टेक्सचर
फास्ट फैशन की चकाचौंध के बीच अंशुल का ब्रांड स्लो फैशन का सिग्नेचर पहनता है। महामारी के बाद कृष्णा वूल ने ऑर्गेनिक शॉल्स की लाइन शुरू की। रासायनिक रंगों से दूरी, प्राकृतिक ऊन और न्यूनतम डाई का इस्तेमाल। अगर दावा है कि शाल 100% ऊन की है, तो वह 100% ऊन ही होगी। यही ईमानदारी उनके ब्रांड का फैब्रिक है। पश्मीना, किन्नौरी, स्टोल, ट्वीड और खास तौर पर याकूल शॉल्स, जिन्हें बनने में महीनों लगते हैं। यह मास प्रोडक्शन नहीं, बल्कि मास्टरपीस हैं। ऐसा फैशन जिससे प्रकृति, कारीगर और उपभोक्ता तीनों को फायदा हो रहा है।
रिज पर रिकॉर्ड, दिल में संतोष
जब रिज मैदान पर एक ही स्थान पर सबसे अधिक हाथ से बनी शॉलों का प्रदर्शन हुआ और गिनीज़ रिकॉर्ड दर्ज हुआ, तो ओम प्रकाश मल्होत्रा उस पल के साक्षी थे। उनकी शालें शो-स्टॉपर बनीं और अंशुल की यात्रा फादर डॉटर कोलैब का सबसे खूबसूरत कलेक्शन बन गई। हर धागा जिम्मेदारी से बुना गया है और हर शाल, हिमाचल प्रदेश की आत्मा को ओढ़े हुए है।
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