शिमला की कारीगरी को दुनिया तक ले जाने वाला अंग्रेज़, विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम लंदन में संरक्षित जॉन लॉकवुड किपलिंग का बनाए स्केच

शिमला की कारीगरी को दुनिया तक ले जाने वाला अंग्रेज़, विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम लंदन में संरक्षित जॉन लॉकवुड किपलिंग का बनाए स्केच
शिमला की कारीगरी को दुनिया तक ले जाने वाला अंग्रेज़, विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम लंदन में संरक्षित जॉन लॉकवुड किपलिंग का बनाए स्केच
विनोद भावुक। शिमला
ब्रिटिश राज के दौरान शिमला में एक अंग्रेज़ कलाकार ऐसा भी था, जिसने पहाड़ों के साधारण कारीगरों में असाधारण प्रतिभा देखी। एक संवेदनशील कलाकार, शिक्षक और विरासत-संरक्षक जॉन लॉकवुड किपलिंग ने साल 1870 के आसपास शिमला में रहते हुए यहां के लकड़ी के कारीगरों को अपने स्केच में उतारा और चित्रों में अमर कर दिया।
प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग के पिता लॉकवुड किपलिंग का मशहूर स्केच ‘वुड कार्वर एट शिमला’ आज भी इस बात की गवाही देता है कि अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान भी कोई कलाकार हिमालयी कारीगरी को सम्मान की नज़र से देखता था। ये स्केच केवल चित्र नहीं हैं, डेढ़ दशक पहले के दस्तावेज़ थे, जिनमें शिमला की मेहनत, हुनर और संस्कृति कैद है।
मुंबई और लाहौर के आर्ट स्कूलों के प्रिंसिपल
शिमला, पंजाब और कश्मीर की यात्राओं में लॉकवुड किपलिंग ने कारीगरों, बाज़ारों और लोकजी वन के जो स्केच बनाए, डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम लंदन जैसे प्रतिष्ठित संग्रहालय में सुरक्षित हैं। लॉकवुड किपलिंग ने बंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट और बाद में लाहौर के मायो स्कूल ऑफ़ आर्ट के प्रिंसिपल रहे।
लॉकवुड किपलिंग ने भारतीय शिल्पकारों को प्रशिक्षित किया, डिज़ाइनर बनाया और परंपरागत हुनर को आधुनिक पहचान दी। दिलचस्प यह है कि जिन कारीगरों को औपनिवेशिक व्यवस्था अक्सर लोकल कहकर नज़रअंदाज़ करती थी, लॉकवुड किपलिंग ने उन्हें ही अपनी कला का नायक बना कर अमर कर दिया।
स्केच में सत्ता नहीं, संवेदना के दर्शन
शिमला के काष्ठ-शिल्प, नक्काशी और लोक सौंदर्य ने लॉकवुड किपलिंग के भीतर के कलाकार को इतना प्रभावित किया कि वे भारतीय कला के आजीवन संरक्षक बन गए। उनके संरक्षण में प्रशिक्षित भाई राम सिंह जैसे शिल्पकारों ने आगे चलकर भारत की कई शाही इमारतों को सजाने में अहम भूमिका अदा की।
लॉकवुड किपलिंग का योगदान शिमला के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि उनके काम में सत्ता नहीं, संवेदना दिखती है। डेढ़ सदी बाद भी उनके बनाए स्केच हमें बताते हैं कि शिमला की आत्मा उसके कारीगरों में बसती थी। शिमला के कारीगरों का दुर्लभ स्केच भारतीय शिल्प को वैश्विक मंच तक पहुंचाने और औपनिवेशिक दौर में लोककला का सम्मान का प्रतीक है।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/the-1st-kent-cyclist-battalion-stayed-in-dagshai-for-74-days-after-the-first-world-war-before-departing-for-england/

Jyoti maurya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *