मनाली के ‘मॉडर्न टेलर’ से खास जैकेट सिलवाई, पोस्ट ऑफिस से भेजी पर इंगलैंड नहीं पहुंच पाई

मनाली के ‘मॉडर्न टेलर’ से खास जैकेट सिलवाई, पोस्ट ऑफिस से भेजी पर इंगलैंड नहीं पहुंच पाई
मनाली के ‘मॉडर्न टेलर’ से खास जैकेट सिलवाई, पोस्ट ऑफिस से भेजी पर इंगलैंड नहीं पहुंच पाई
विनोद भावुक। मनाली
47 साल पहले इंग्लैंड के वार्विकशायर की ट्रूडी रिचर्ड्स को मनाली में उनके बॉयफ्रेंड ने एक स्थानीय दर्ज़ी ‘मॉडर्न टेलर’ से खास जैकेट सिलवाई। यह जैकेट पहाड़ों के लिए परफेक्ट थी, क्योंकि इसमें सूती कपड़ा, अंदर ऊन और लिनन की परत थी। जैकेट को लंदन भेजने के लिए सफ़ेद कपड़े में सिला गया और उस पर मोम की सील लगाई गई।
इस खास गिफ्ट को मनाली पोस्ट ऑफिस से भेजा गया, लेकिन अफ़सोस जैकेट रास्ते में चोरी हो गई। ट्रूडी रिचर्ड्स ने 1978 की मनाली भ्रमण की यादों को ताज़ा करते हुए कई संस्मरण लिखे हैं। वह और उनका दोस्त लंदन से पुराने सीए बेडफोर्ड ट्रक पर सवार होकर आए थे और बर्फ़ गिरने से पहले हिमालय की गोद में कुछ दिन बिताना चाहते थे।
शिमला में ‘वन-वे’ ने पहुंचाया पुलिस स्टेशन
ट्रूडी रिचर्ड्स अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में अपनी यात्रा की तसवीरों के साथ लिखती हैं कि अक्टूबर 1978 का महीना था। शिमला के पास एक अजीब घटना हुई। रात गुज़ारने की जगह ढूंढते समय पुलिस ने उन्हें रोक लिया। वन वे का एक छोटा-सा बोर्ड था, जो लताओं से पूरी तरह ढका होने के कारण उन्होंने नहीं देखा था। उन पर इल्ज़ाम था वन-वे सड़क पर गलत दिशा में गाड़ी चलाना।
थाने में उनके बयान लिखे गए। फर्श पर हथकड़ी पहने बैठा एक कैदी देखकर ट्रूडी के डर और जिज्ञासा से भरा अनुभव हुआ। उनके पासपोर्ट चैक किए गए। यहीं मामला खत्म हुआ और वे रिहा कर दिए गए। ट्रूडी लिखती हैं कि वहीं उनके बॉयफ्रेंड के पैसे रह गए। शिमला से आगे बढ़ते हुए सड़क और दृश्य दोनों ही जंगली, सुंदर और रोमांच से भरे थे।
मनाली में उन्होंने ‘कल्पना गेस्ट हाउस’
ट्रूडी रिचर्ड्स ने लिखा है कि छोटे-छोटे कस्बों से गुजरते हुए पहाड़ ऊंचे होते जा रहे थे, और सड़कें संकरी व खतरनाक। मनाली की ओर चढ़ाई वाली यात्रा किसी परीक्षा से कम नहीं थी। बर्फ़ से ढके पहाड़, देवदार के जंगल, और ऐसे मोड़ जहाँ सामने से आती गाड़ी सिर्फ़ आख़िरी पल में दिखती थी।
एक ओर ऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ हज़ार फ़ुट गहरी खाई। ज़रा-सी चूक का मतलब था निश्चित मौत, लेकिन वे सुरक्षित मनाली पहुँच गए। मनाली में उन्होंने ‘कल्पना गेस्ट हाउस’ में ठहराव किया, जो अब शायद इतिहास की बात बन चुका है। ट्रूडी लिखती हैं, तब का मनाली लकड़ी की झोपड़ियों, छोटे घरों और अद्भुत खाने की हट्टियों से भरा था।
लोग बेहद प्यारे और लाजवाब नज़ारे
ट्रूडी रिचर्ड्स अपनी पोस्ट में लिखती हैं कि यह जानकर उन्हें खुशी हुई कि वे रोज़ जिस जंगल में वे टहलते थे, वह आज नेशनल पार्क बन चुका है, पर वह मशहूर आलू छँटाई ग्राउंड अब कहीं दिखाई नहीं देता। वे लिखती हैं कि उन्हें मनाली उसकी सादगी के लिए याद है। वहाँ के लोग बेहद प्यारे थे और नज़ारे लाजवाब थे।
जब वे मनाली थे तो स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी कि जब सामने वाले पहाड़ पर बर्फ़ एक तय सीमा तक आ जाए, तो तुरंत निकल जाना, वरना सारी सर्दी यहीं फंस जाओगे। रोमांच भरा सुखद अनुभव लेकर वे मनाली से विदा लेकर मुंबई की ओर निकल पड़े। कहानी इसलिए खास है कि 1978 का मनाली आज भी कहानियों में ज़िंदा है।
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Jyoti maurya

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