शिमला की पहाड़ियों में चिकित्सा सेवा की अनूठी मिसाल, महिला स्वास्थ्य को समर्पित रहीं डॉ. जमिनी सेन
शिमला की पहाड़ियों में चिकित्सा सेवा की अनूठी मिसाल, महिला स्वास्थ्य को समर्पित रहीं डॉ. जमिनी सेन
विनोद भावुक। शिमला
औपनिवेशिक भारत के दौर में शिमला महिला चिकित्सा सेवा के एक ऐतिहासिक प्रयोग और भरोसे का साक्षी भी रहा है। महिला चिकित्सा सेवा में डॉ. जमिनी सेन एक प्रेरक नाम है, जो भारत की शुरुआती महिला चिकित्सकों में शामिल थीं। वे ब्रिटिश साम्राज्य में चिकित्सा के उच्चतम अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला भी बनीं।
डॉ. जमिनी सेन ने भारत लौटने के बाद काउंटेस ऑफ डफरिन फंड से जुड़े अस्पतालों में कार्य किया। उनकी सेवाएं आगरा, शिमला, शिकारपुर और अकोला जैसे शहरों तक फैली थीं। शिमला में उनका कार्यकाल उस दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण था, जब भारतीय महिलाएँ सामाजिक कारणों से पुरुष डॉक्टरों से इलाज कराने में हिचकिचाती थीं।
डबलिन, बर्लिन और लंदन से ट्रेनिंग
20 जून 1871 को बरिसाल (अब बांग्लादेश) में एक ब्रह्मो परिवार में जन्मी जमिनी सेन का शिक्षा और सुधार से गहरा नाता था। उनकी बहन कामिनी राय ब्रिटिश भारत की पहली महिला ऑनर्स ग्रेजुएट और प्रसिद्ध नारीवादी थीं। जमिनी सेन ने बेथ्यून कॉलेज, कोलकाता से 1890 में एफ.ए. किया और कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से 1897 में मेडिसिन एंड सर्जरी की डिग्री ली।
1911 में उन्हें डफरिन फंड छात्रवृत्ति मिली, जिसके बाद वे उच्च चिकित्सा अध्ययन के लिए ब्रिटेन गईं।
1912 में उन्होंने इतिहास रचते हुए रॉयल फैकल्टी ऑफ फिज़िशियंस एंड सर्जन्स ऑफ ग्लासगो की पहली महिला फेलो बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद उन्होंने डबलिन के रोटुंडा अस्पताल, बर्लिन, और लंदन स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन में भी प्रशिक्षण लिया।
नेपाल से शिमला तक: सेवा का विस्तार
भारत लौटने से पहले, डॉ. जमिनी सेन ने नेपाल में 1899 से लगभग एक दशक तक शाही परिवार की चिकित्सक और काठमांडू ज़नाना अस्पताल की प्रमुख के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद शिमला सहित उत्तर भारत के कई शहरों में उनका कार्य महिला और मातृ स्वास्थ्य के लिए एक मजबूत आधार बना। यह सामाजिक बदलाव की एक शांत, लेकिन निर्णायक शुरुआत थी।
डॉ. जमिनी सेन ने विवाह नहीं किया और अपना संपूर्ण जीवन चिकित्सा और महिलाओं की सेवा को समर्पित कर दिया। बाद के वर्षों में वे कोलकाता के बलदे ओदास मैटरनिटी होम की प्रमुख रहीं। भारतीय महिला डॉक्टर पर भरोसा होने के कारण इलाज के लिए आने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी। 1932 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका कार्य चिकित्सा इतिहास में जीवित है।
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