लाहौर कॉलेज से निष्कासित किए तो मदन लाल ढींगरा ने कालका में टांगा सेवा सर्विस कंपनी ने कर ली नौकरी, पहाड़ ने दिया ब्रिटिश सत्ता से टकराने का साहस
लाहौर कॉलेज से निष्कासित किए तो मदन लाल ढींगरा ने कालका में टांगा सेवा सर्विस कंपनी ने कर ली नौकरी, पहाड़ ने दिया ब्रिटिश सत्ता से टकराने का साहस
विनोद भावुक। शिमला
1904 में स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में ब्रिटिश कपड़ों का विरोध करने पर जब स्वतन्त्रता सेनानी मदन लाल ढींगरा को लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से निष्कासित किया गया, तो उनके लिए घर के दरवाज़े भी बंद हो गए। यही वह क्षण था, जब वे सत्ता से टकराने वाले छात्र से संघर्ष से तपे युवा में बदलने लगे और इस बदलाव की भूमि बनी शिमला की पहाड़ियां।
इतिहास अक्सर हमें लंदन की अदालत और फांसी का तख्ता दिखाता है, लेकिन मदन लाल ढींगरा की क्रांतिकारी यात्रा का असली मोड़ शिमला की इन्हीं पहाड़ियों में आया। शिमला की तलहटी, कालका और आसपास का पहाड़ी इलाका इस क्रांतिकारी की कर्मभूमि बना और यहीं से उन्होंने देश की आजादी के लिए अलख जलाई थी।
अंग्रेज़ी ऐश थी, भारतीयों का अपमान
मदन लाल ढींगरा ने कालका में एक ऐसी कंपनी में नौकरी की, जो टांगा सेवा के ज़रिए अंग्रेज़ अफसरों और उनके परिवारों को गर्मियों में शिमला पहुँचाती थी। दिन भर वे गोरे साहबों की शानो-शौकत और पहाड़ी मजदूरों की बदहाली देखते। भारतीय कर्मचारियों के साथ अक्सर ब्रिटिश अफसर अपमानजनक व्यवहार करते थे।
ढींगरा के मन में यह सवाल गूंजाता कि अगर यही राज है, तो देश को आज़ादी क्यों न मिले? कालका में नौकरी के दौरान उन्होंने मज़दूरों को संगठित करने की कोशिश की। ब्रिटिश अफसरों से सवाल पूछे और न्याय की बात की, जिसका नतीजा यह निकाला कि इंसबॉर्डिनेशन का आरोप लगाकर नौकरी से बर्खास्त कर दिये गए।
शिमला–कालका में दिखा अंग्रेजों का असली चेहरा
बर्खास्तगी ही ढींगरा की क्रांति का पहला प्रमाण-पत्र बन गई। इतिहासकार मानते हैं कि लाहौर ने ढींगरा को विचार दिए पर शिमला–कालका ने उन्हें व्यवस्था का असली चेहरा दिखाया। यही पहाड़ी अनुभव उन्हें श्रमिकों की पीड़ा से जोड़ता और सत्ता की नैतिकता पर सवाल उठाने की ताकत देता था। यहीं से वे उस रास्ते पर बढ़े, जो आगे चलकर लंदन के इंडिया हाउस और फाँसी के तख़्त तक गया।
अगर ढींगरा शिमला की पहाड़ियों में अंग्रेज़ों की ऐश, कालका में भारतीयों का अपमान न देखते और पहाड़ों में श्रमिकों की चुप चीख न सुनते तो शायद इतिहास कुछ और होता। लेकिन सच यही है कि शिमला की पहाड़ियों में अंग्रेजों के खिलाफ जगा विद्रोह ही बाद में इंग्लैंड के दिल लंदन में गोली बनकर गूंजा था।
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