सिरमौर की दलित वीरांगना आल्मो देवी, जिसकी दिलेरी से थर- थर काँपते थे अंग्रेज़, ‘काले पानी’ की हुई थी सजा
सिरमौर की दलित वीरांगना आल्मो देवी, जिसकी दिलेरी से थर- थर काँपते थे अंग्रेज़, ‘काले पानी’ की हुई थी सजा
हिमाचल बिजनेस विशेष। नाहन
आज प्रेरक कहानी सिरमौर रियासत की दलित वीरांगना आल्मो देवी की, जो रियासत में चल रहे प्रजामंडल आंदोलन को धार देने में सबसे अगली पंक्ति में खड़ी थी। रियासती शासन और अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मुखर आल्मो देवी की सक्रियता से ब्रिटिश शासन इतना भयभीत था कि उन्हें ‘काले पानी’ की सजा सुनाई गई थी।
आल्मो देवी का योगदान इतिहास के पन्नों में कम ही दर्ज हुआ है। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आर्ट एंड एजुकेशन रिसर्च’ में प्रकाशित हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ विनय कुमार के रिसर्च पेपर ‘सिरमौर रियासत की महिलाओं का भारत की स्वतन्त्रता में योगादन में’ आल्मो देवी की भूमिका की पड़ताल की है।
गिरफ्तारी देने सराहन जेल तक गईं आल्मो
आल्मो देवी का विवाह शिलाई क्षेत्र के माठा राम से हुआ था, जो खुद सिरमौर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य थे। प्रजामंडल आंदोलन में सक्रियता के कारण माठा राम को नाहन कोर्ट ने पाँच वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि बाद में ट्रिब्यूनल कोर्ट ने सुनवाई के पश्चात उन्हें और अन्य आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया।
साल 1939 में जब धारा 353 के अंतर्गत प्रजामंडल सदस्यों की गिरफ्तारियों के वारंट जारी हुए, तब आल्मो देवी भी गिरफ्तारी देने वाले पहले जत्थे में शामिल थीं। वे वैद्य सूरत सिंह की पत्नी सुनहरी देवी के साथ सराहन जेल तक गईं। हालांकि उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया, लेकिन उन्होंने तहसील कार्यालय के बाहर जमकर नारेबाजी की।
काले पानी की सजा का सच
प्रोफेसर डॉ विनय कुमार लिखते हैं कि आल्मो देवी की सक्रियता से ब्रिटिश शासन इतना भयभीत हुआ कि उन्हें काले पानी’ की सजा सुनाई गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज गौरी प्रसाद डेढ़ वर्ष ‘काले पानी’ की सजा सुनाए जाने की बात सामने लाते हैं। हालांकि पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें वास्तव में सजा हुई या बाद में रिहा कर दिया गया।
आल्मो देवी सिरमौर प्रजामंडल आंदोलन की सक्रिय सदस्य थीं। यह आंदोलन रियासती शासन और ब्रिटिश सत्ता के अन्याय के खिलाफ चलाया गया था। उन्होंने देश की आज़ादी के संघर्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वे दलित समुदाय से संबंध रखती थीं। उन्होंने न केवल आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, बल्कि समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए भी जीवनभर काम किया।
जीवन त्याग, साहस और समर्पण
आल्मो देवी ने एक लंबा जीवन जिया और शतकीय पारी खेली। 10 दिसंबर 2011 को 105 वर्ष की आयु में राजगढ़ तहसील के बझौन गांव में आल्मो देवी का निधन हुआ। उनकी कोई संतान नहीं थी। आल्मो देवी देवी जैसी वीरांगना का योगदान भले ही इतिहास के पन्नों में कम दर्ज हो, लेकिन देश की आजादी के लिए उनका संघर्ष और भूमिका गर्व की बात है।
इतिहास आल्मो देवी को इसलिए याद रखेगा, क्योंकि उन्होंने रियासती शासन और अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाई। होने के बावजूद सामाजिक बंधनों को तोड़ा, दलित समाज के उत्थान के लिए कार्य किया। उनका जीवन त्याग, साहस और समर्पण का उदाहरण है। उनकी कहानी प्रेरणा का दीपक बनकर हमेशा जलती रहेगी।
Photo : AI Generated
