अमृता शेरगिल : शिमला से पेरिस तक रंगों की खोज, लाहौर में बिखर गए जीवन के रंग

अमृता शेरगिल : शिमला से पेरिस तक रंगों की खोज, लाहौर में बिखर गए जीवन के रंग
अमृता शेरगिल : शिमला से पेरिस तक रंगों की खोज, लाहौर में बिखर गए जीवन के रंग
विनोद भावुक। शिमला
कला का उद्देश्य सौंदर्य नहीं, जीवन की सच्चाई दिखाना है। इस विचार के साथ 1913 में हंगरी के बुडापेस्ट के एक कलात्मक घर में जन्मी एक बच्ची ने आगे चलकर भारतीय चित्रकला की दिशा ही बदल दी। नाम था अमृता शेरगिल। पिता उमराव सिंह शेरगिल मजीठिया, संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान थे और माता मैरी एंटोइनेट गोटेसमैन हंगरी की यहूदी ओपेरा गायिका थी।
कला अमृता के जीवन का संस्कार बन गई थी। पांच साल की उम्र में ब्रश उठाया, नौ साल की उम्र में शिमला के गेयटी थिएटर में मंच पर गाना और अभिनय शुरू किया। कौन जानता था, यही नन्ही कलाकार आगे चलकर भारतीय आधुनिक कला की पहली ‘देवी’ बन जाएगी।
पेंटिंग ‘यंग गर्ल्स’ के पेरिस में चर्चे
1921 में उमराव सिंह शेरगिल मजीठिया का परिवार शिमला के समरहिल में आ बसा। यहां हिमालय की गोद में अमृता ने प्रकृति को, चेहरों को और मानवीय भावनाओं को देखा, जो आगे चलकर उसके ब्रश का स्थायी विषय बने। 16 साल की उम्र में वह मां के साथ पेरिस चली गईं।
अमृता ने पेरिस में यूरोपीय कलाकारों सेज़ान, गाउगिन, और मातीस से प्रभावित होकर आधुनिक चित्रकला सीखी। 1932 में अमृता की प्रसिद्ध पेंटिंग ‘यंग गर्ल्स’ ने उन्हें ग्रैंड सेलोन ऑफ पेरिस की एसोसिएट मेम्बर बना दिया। वह अब तक की सबसे कम उम्र की और एकमात्र एशियाई कलाकार थीं जिन्हें यह सम्मान मिला।
रंगों में अपनी मिट्टी की गंध
पेरिस की सफलता के बावजूद, अमृता को भीतर से एक आवाज़ सताने लगी, ‘मेरा भविष्य भारत में है।‘
1934 में वह भारत लौटीं और बोलीं,‘ मैं केवल भारत में ही चित्र बना सकती हूँ। यूरोप पिकासो, मातीस, ब्रैक का है, भारत केवल मेरा है।’ भारत लौटकर उन्होंने अजंता की गुफाओं, मुगल और पहाड़ी चित्रकला की परंपराओं को आत्मसात किया।
उनका ब्रश अब केवल रंग नहीं, भारत की आत्मा उकेरने लगा। 1937 में उन्होंने दक्षिण भारत का भ्रमण किया और तीन अद्भुत कृतियाँ ‘ब्राइद्ज टॉयलेट, ‘ब्रह्मचारी’ और ‘ साउथ इंडियन विलेजर्स गोइंग टू मार्केट’ बनाईं, जिनमें गरीबी, साधारणता और भारतीय जीवन का अद्भुत यथार्थ है। उनकी कला में यूरोपीय अनुशासन था, पर आत्मा पूरी तरह भारतीय थे।
28 साल की बिखर गए रंग
1938 में अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई डॉ. विक्टर एगन से विवाह किया और गोरखपुर के सराया गाँव में बस गईं। उन्होंने ‘विलेज सीन’, “इन द लेडीज एनक्लोजर’ और ‘सिस्टा’ जैसी कृतियाँ रचीं, जिनमें भारतीय गाँवों की लय और स्त्रियों की गहराई दिखाई देती है। उनकी चित्रकला शैली ने रवींद्रनाथ टैगोर और जामिनी रॉय के समानांतर एक नई धारा बनाई।
1941 में अमृता लाहौर गईं, जो तब भारत का सांस्कृतिक केंद्र था। यहां 23 गंगा राम मेंशन्स में उन्होंने अपना स्टूडियो बनाया, पर किस्मत ने उन्हें ज्यादा वक़्त नहीं दिया। 6 दिसंबर 1941 की रात अपनी पहली बड़ी एकल प्रदर्शनी से कुछ दिन पहले सिर्फ़ 28 साल की उम्र में अमृता का जीवन कैनवास अधूरा रह गया।
‘हिल वुमेन’ पर डाक टिकट, दिल्ली का अमृता शेरगिल मार्ग
अमृता शेरगिल की मृत्यु के कारण आज भी रहस्य हैं, पर उनकी कला ने मृत्यु को भी मात दे दी। उन्होंने न केवल भारतीय चित्रकला को नई दिशा दी, बल्कि एक स्त्री कलाकार के रूप में पुरुष प्रधान समाज में अपनी पहचान बनाई। आज अमृता शेरगिल की पेंटिंग्स राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, दिल्ली में सुरक्षित हैं।
उनकी पेंटिंग ‘विलेज सीन’ साल 2006 में 6.9 करोड़ रुपये में बिकी। भारत में किसी भी पेंटिंग के लिए अब तक की सबसे ऊंची कीमतों में से एक। 1978 में उनकी पेंटिंग ‘हिल वुमेन’ पर डाक टिकट जारी हुआ। दिल्ली की एक सड़क अमृता शेरगिल मार्ग के नाम से जानी जाती है।
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Jyoti maurya

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