एक अधूरी कहानी, जिसे दूसरे कथाकार ने पूरा किया, हिंदी साहित्य में अनोखी घटना
एक अधूरी कहानी, जिसे दूसरे कथाकार ने पूरा किया, हिंदी साहित्य में अनोखी घटना
विनोद भावुक | धर्मशाला
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की चौथी कहानी ‘हीरे का हार’ अधूरी रह गई थी, लेकिन साहित्य में विरासत कभी अधूरी नहीं रहती। पालमपुर में रहने वाले प्रसिद्ध कथाकार डॉ. सुशील कुमार ‘फुल्ल’ ने उनकी इस कहानी को पूरा किया। हिंदी साहित्य में यह घटना अनोखी है, जब एक लेखक की अधूरी रचना को दूसरे लेखक ने सम्मानपूर्वक पूरा किया। यह परंपरा और सम्मान का अद्भुत उदाहरण है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में चंद्रधर शर्मा गुलेरी कम लिखकर भी अमर हो गए। कांगड़ा के गुलेर गाँव के इस प्रतिभाशाली लेखक ने 1915 में ‘उसने कहा था’ कहानी लिखी जिससे हिंदी कथा साहित्य की दिशा बदल गई। उन्होंने केवल चार कहानियाँ लिखीं। ‘उसने कहा था’, ‘सुखमय जीवन’, ‘बुद्धू का कांटा’ और
‘हीरे का हार’। हीरे का हार कहानी अधूरी थी, जिसे डॉ. सुशील कुमार ‘फुल्ल’ ने पूरा किया।
हाथ से लिखी ‘उसने कहा था’ की प्रति
चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी के पौत्र साहित्यकार स्वर्गीय डॉ. पीयूष गुलेरी ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध कर पीएचडी की। उनके दूसरे भाई स्वर्गीय डॉ. प्रत्यूष गुलेरी ने उनकी सभी रचनाओं को एक वृहद ग्रंथ के रूप में संकलित किया और जिसे भारतीय साहित्य अकादमी ने प्रकाशित किया। ‘उसने कहा था’ की हस्तलिखित प्रति और दुर्लभ चित्र भी अमूल्य धरोहर के रूप में गुलेरी परिवार के पास सुरक्षित हैं।
हिमाचल प्रदेश कला एवं संस्कृति विभाग ने उनके नाम पर प्रतिष्ठित पुरस्कार स्थापित किया है। हरिपुर गुलेर के राजकीय महाविद्यालय का नाम भी चंद्रधर शर्मा गुलेरी के नाम पर रखा गया है। चार कहानियां कहानियाँ लिखकर हिंदी कथा जगत में अमर होने वाले चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जीवन हमें सिखाता है कि संख्या नहीं, गुणवत्ता इतिहास बनाती है।
कहानी जो बन गई अफसाना
7 जुलाई 1883 को जन्मे गुलेरी जी का जीवन बहुत लंबा नहीं था। मात्र 39 वर्ष की आयु में 12 सितम्बर 1922 को उनका निधन हो गया। लेकिन ‘उसने कहा था’ कहानी ने उन्हें हिंदी साहित्य में अमर कर दिया। जब यह कहानी ‘सरस्वती पत्रिका’ में प्रकाशित हुई, तो साहित्य जगत में हलचल मच गई। आज यह कहानी देश-विदेश के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल है।
इस अमर कहानी पर 1960 में ‘उसने कहा था’ फिल्म भी बनी, जिसमें निर्देशन था मोनी भट्टाचार्य का और अभिनय किया था सुनील दत्त और नंदा ने। एक छोटी-सी प्रेम कहानी, जो अमृतसर की पृष्ठभूमि में लिखी गई थी। बड़े पर्दे पर भी उतनी ही मार्मिक साबित हुई। प्रेम और बलिदान की इस कथा को पर्दे पर सितारों में खूबसूरत तरीके से जिया था।
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