विश्लेषण : राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस- भाजपा की लड़ाई, सबसे बड़ा सवाल यह कि ओबीसी याद नहीं आई

विश्लेषण : राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस- भाजपा की लड़ाई, सबसे बड़ा सवाल यह कि ओबीसी याद नहीं आई
विश्लेषण : राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस- भाजपा की लड़ाई, सबसे बड़ा सवाल यह कि ओबीसी याद नहीं आई
विनोद भावुक। धर्मशाला
हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा की एक सीट 9 अप्रैल को खाली हो रही है, क्योंकि भाजपा सांसद इन्दु गोस्वामी अपना कार्यकाल पूरा कर रही हैं। वे अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखती हैं और राजनीतिक दृष्टि से सबसे बड़े कांगड़ा जिले का प्रतिनिधित्व करती हैं। सवाल यह है कि क्या इस बार भी ओबीसी को फिर राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिलेगा या फिर यह अवसर भी राजनीतिक गणित की भेंट चढ़ जाएगा?
हिमाचल प्रदेश में ओबीसी समुदाय पिछले लंबे समय से आरक्षण, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक अधिकारों को लेकर सक्रिय है। कई जिलों के कई विधानसभा क्षेत्रों में ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। पंचायत से लेकर विधानसभा तक उनकी उपस्थिति है, लेकिन उच्च सदन राज्यसभा में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व सीमित रहा है।
इंदु गोस्वामी के कार्यकाल के बाद यदि किसी अन्य ओबीसी चेहरे को मौका नहीं मिलता, तो यह संदेश जाएगा कि प्रदेश के दोनों बड़े राजनीतिक दल इस वर्ग को केवल वोट बैंक की तरह देखते हैं। पांच मार्च नामांकन की अंतिम तिथि है। यदि भाजपा उम्मीदवार नहीं उतारती, तो 16 मार्च को चुनाव की जरूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन मुकाबला हुआ, तो संख्या का नहीं, सामाजिक संतुलन का भी चुनाव होगा।
कांग्रेस के पास 40 विधायक हैं और भाजपा के पास 28 विधायक हैं। संख्या बल कांग्रेस के पास है, लेकिन पिछले चुनाव में क्रॉस वोटिंग के चलते कांग्रेस उम्मीदवार हार गए थे। इस बार पार्टी के भीतर प्रतिभा सिंह और कौल सिंह ठाकुर जैसे नाम चर्चा में हैं। कांग्रेस के संभावित नामों में ओबीसी प्रतिनिधित्व फिलहाल नजर नहीं आ रहा।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन और जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। जातीय समीकरणों को साधते हुये भाजपा एसटी से किशन कपूर, ओबीसी से इन्दु गोस्वामी, एससी से सिकंदर कुमार को राज्यसभा भेज चुकी है। इस बार यदि ओबीसी वर्ग से किसी योग्य नेता को आगे लाया जाता है, तो यह राजनीतिक असंतोष कम करेगा और भविष्य के चुनावों के लिए मजबूत आधार बनेगा।
यदि दोनों दल इस वर्ग की अनदेखी करते हैं, तो ओबीसी की लामबंदी और तेज हो सकती है। राज्यसभा की यह सीट केवल एक संसदीय पद नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की सामाजिक राजनीति का आईना है। देखना यह है कि कांग्रेस और भाजपा—दोनों में से कौन ओबीसी समाज की उम्मीदों को प्राथमिकता देता है। राजनीति में समय पर लिया गया निर्णय पूरे सामाजिक समीकरण को बदल सकता है।
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Jyoti maurya

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