लाहौल के प्रकृति इतिहास के अग्रदूत, ब्रिटिश सेना के डॉक्टर एंड्रयू लीथ एडम्स
लाहौल के प्रकृति इतिहास के अग्रदूत, ब्रिटिश सेना के डॉक्टर एंड्रयू लीथ एडम्स
विनोद भावुक। केलंग
यह वह दौर था, जब यूरोप में हिमालय को रहस्यमयी सीमा माना जाता था और लाहौल उस रहस्य का केंद्र था। 150 साल पहले उस दौर में स्कॉटलैंड में जन्मे एंड्रयू लीथ एडम्स लाहौल–लद्दाख की घाटियों में प्रकृति-विज्ञान के रहस्य को समझने में जुटे थे। लाहौल घाटी उनके वैज्ञानिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय रहीं।
लाहौल घाटी उस दौर में हिमालयी प्रकृति-विज्ञान की प्रयोगशाला थी। इस प्रयोगशाला के प्रमुख वैज्ञानिकों में एंड्रयू लीथ एडम्स का नाम इसलिए खास था, क्योंकि ब्रिटिश सेना में चिकित्सक होने के बावजूद वे प्रकृतिवादी और भूवैज्ञानिक थे। एक चिकित्सक से ज्यादा उन्हें दुनिया भर में उनकी प्रकृति और भूवैज्ञान की खोजों के लिए ख्याति मिली।
फौजी अफसर के लिए जनून बन गया अध्ययन
19वीं सदी में ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा करते हुए एडम्स की तैनाती पश्चिमी हिमालय के इलाक़ों कश्मीर, लद्दाख और लाहौल तक रही। सेना की ड्यूटी के बाद उनका असली जुनून शुरू होता था। उनका काम था पश्चिमी हिमालय में पाये जाने वाले पक्षियों का अवलोकन करना, स्तनधारियों का अध्ययन करना और हिमालयी भू-रचना को समझना।
लाहौल की ऊंचाई, बर्फीली झीलें और अल्पाइन मैदान उनके लिए भौगोलिक चुनौती नहीं वैज्ञानिक खजाना थे। एडम्स ने हिमालय में रहते हुए ऑरेंज बुलफिंच की खोज की, तिब्बती पठार की झीलों में ब्राउन-हेडेड गल के पहले प्रजनन स्थल दर्ज किए और लाहौल–लद्दाख क्षेत्र के पक्षी जीवन पर शोध को वैश्विक मंच तक पहुंचाया।
लंदन की किताबों में, लाहौल का ज़िक्र
एडम्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द बर्ड्स ऑफ कश्मीर एंड लद्दाख’ आज भी हिमालयी ऑर्निथोलॉजी की आधारशिला मानी जाती है। 1867 में प्रकाशित उनकी किताब ‘वांडरिंगस ऑफ ए नेचरलिस्ट इन इंडिया, ड वेस्ट्रेन हिमालयाज एंड कश्मीर’ में लाहौल की जलवायु, पक्षियों, स्तनधारियों और जीवन-शैली के ऐसे विवरण मिलते हैं, जो वर्तमान भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ हैं।
20 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद एडम्स ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन में प्रोफेसर बने। वे रॉयल सोसाइटी के फेलो और भूविज्ञान व जीवाश्म विज्ञान के अग्रणी विद्वान थे। उनके नाम पर ऑरेंज बुलफिंच और प्राचीन जीवों की प्रजातियों की खोज दर्ज हैं। उन्होंने 150 साल पहले लहौल घाटी की जैव-विविधता का दस्तावेजीकरण कर दिया था।
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