अन्नाडेल: शिमला की वादियों में बसी मुहब्बत की एक कहानी, 1905 में पोस्टकार्ड में छपी थी इस मैदान की तस्वीर

अन्नाडेल: शिमला की वादियों में बसी मुहब्बत की एक कहानी, 1905 में पोस्टकार्ड में छपी थी इस मैदान की तस्वीर
अन्नाडेल: शिमला की वादियों में बसी मुहब्बत की एक कहानी, 1905 में पोस्टकार्ड में छपी थी इस मैदान की तस्वीर
हिमाचल बिजनेस स्पेशल। शिमला
ब्रिटिश दौर का शिमला सिर्फ़ सत्ता का केंद्र नहीं था, वह यादों, पिकनिक, पोलो और प्रेम की कहानियों का शहर भी था। और इन्हीं कहानियों के बीच एक नाम बार-बार उभरता है अन्नाडेल। 1905 में कोलकाता की प्रसिद्ध फर्म जॉनसन एंड होफसन का प्रकाशित एक कोलोटाइप पोस्टकार्ड आज भी उस दौर की गवाही देता है। एक छोटा सा चित्र अपने भीतर इतिहास की बड़ी कहानी समेटे हुए है।
ब्रिटिश काल के वरिष्ठ लेखक और शिमला के इतिहासकार एडवर्ड बक ने अपनी किताब शिमला फास्ट एंड प्रजेंट (1904) में ऐनाडेल को लेकर लिखा, भवतः शिमला से जुड़ा ऐसा कोई नाम नहीं, जो हजारों एंग्लो-इंडियनों के मन में इतनी सुखद यादें जगा सके जितना अन्नाडेल। वे इसे लगभग एक चौथाई मील व्यास वाला छोटा सा समतल मैदान बताते हैं।
पिकनिक से पोलो ग्राउंड तक
अन्नाडेल वही स्थान था, जहाँ अंग्रेज अधिकारी और उनका परिवार पिकनिक मनाने, सैर करने और सामाजिक मेल-मिलाप के लिए जाया करते थे। समय के साथ यह छोटा मैदान और भी महत्वपूर्ण हो गया। महाराजाओं की मदद से इसे पोलो ग्राउंड के रूप में विकसित किया गया। ब्रिटिश अफसरों के लिए यह मनोरंजन का केंद्र था, जहाँ सत्ता के फैसले भी होते थे और शामें भी रंगीन होती थीं।
एडवर्ड बक के अनुसार, शिमला के शुरुआती राजनीतिक एजेंट और खोजकर्ताओं में से एक मेजर केनेडी इस घाटी की सुंदरता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसका नाम अपनी युवावस्था की एक प्रिय मित्र ‘अन्ना’ के नाम पर रख दिया। अन्नाडेल यानी अन्ना की घाटी। एक प्रेम स्मृति, जो पहाड़ों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
इतिहास, खेल और प्रकृति का संगम
आज भी शिमला का यह मैदान इतिहास, खेल और प्रकृति का संगम है। यह स्थान हमें याद दिलाता है कि शहर सिर्फ इमारतों से नहीं बनते, नामों के पीछे भी भावनाएँ होती हैं और इतिहास में प्रेम की झलक भी छुपी रहती है। अन्नाडेल केवल एक मैदान नहीं है। यह शिमला के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत अध्याय है।
यह कहानी हमें बताती है कि ब्रिटिश काल में शिमला सिर्फ प्रशासनिक राजधानी नहीं था। यह सामाजिक जीवन और खेल संस्कृति का केंद्र भी था और कई बार इतिहास की जड़ें बेहद निजी भावनाओं में छुपी होती हैं। आज जब हम अन्नाडेल की हरियाली में खड़े होते हैं, तो वह सिर्फ़ एक मैदान नहीं, वह 100 साल पुरानी यादों की गूंज है।
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Jyoti maurya

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