शिमला के तिब्बती स्कूल में तीन साल हैडटीचर रहीं कनाडा की पत्रकार और लेखिका बारबरा अज़ीज़

शिमला के तिब्बती स्कूल में तीन साल हैडटीचर रहीं कनाडा की पत्रकार और लेखिका बारबरा अज़ीज़
शिमला के तिब्बती स्कूल में तीन साल हैडटीचर रहीं कनाडा की पत्रकार और लेखिका बारबरा अज़ीज़
विनोद भावुक। शिमला
1959 में तिब्बत पर चीनी नियंत्रण के बाद हजारों तिब्बती शरणार्थी भारत पहुंचे। उसी दौर में कनाडा की प्रसिद्ध मानवशास्त्री, पत्रकार और लेखिका बारबरा निमरी अज़ीज़ आईं और निर्वासित तिब्बतियों के पुनर्वास से संबन्धित मानवीय कार्यों से जुड़ गईं। उन्होंने शिमला में ब्रिटिश ‘सेव द चिल्ड्रन फंड’ द्वारा संचालित तिब्बती बच्चों के स्कूल में प्रधानाध्यापिका के रूप में तीन वर्ष तक सेवा दी।
तिब्बती समाज, भाषा और संस्कृति के प्रति यहीं उनका गहरा लगाव हुआ। शिमला की पहाड़ियों में उन्होंने न केवल शिक्षा दी, बल्कि एक संवेदनशील सांस्कृतिक पुल भी बनाया। तिब्बती शरणार्थियों के साथ सीधे संवाद, शिक्षा और सांस्कृतिक के आदान-प्रदान ने हिमालयी अध्ययन की दिशा में उनके जीवन को निर्णायक मोड़ दिया और वैश्विक मानवीय दृष्टिकोण का विकास किया।
तिब्बती शरणार्थियों पर शोध, नेपाली संत की खोज
शिमला में बिताए गए वर्षों ने बारबरा अज़ीज़ को केवल एक शिक्षिका नहीं, बल्कि एक वैश्विक विचारक और संवेदनशील शोधकर्ता बनाया।शिमला में अनुभवों ने उन्हें मानवशास्त्र (एंथ्रोपोलॉजी) का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के एसओएस से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और नेपाल के सोलुखुम्बु क्षेत्र में तिब्बती शरणार्थियों पर विस्तृत शोध किया।
1978 में प्रकाशित बारबरा अज़ीज़ की प्रसिद्ध पुस्तक ‘तिब्बतेन फ़्रंटियर फैमलीज’ ने तिब्बती समाज की तीन पीढ़ियों के जीवन का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया। निर्वासित तिब्बतियों के जीवन में गहरा झाँकने वाली बारबरा अज़ीज़ ने 20वीं सदी की नेपाली संत और राजनीतिक कार्यकर्ता योगमाया नेयुपाने के जीवन को भी दुनिया के सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
हिमालयी अध्ययन और वैश्विक पत्रकारिता की आवाज़
1989 में न्यूयॉर्क स्थित डब्ल्यूबीएआई रेडियो से जुड़कर बारबरा अज़ीज़ ने मध्य-पूर्व के मुद्दों पर रिपोर्टिंग की। उनकी पुस्तक ‘स्विमिंग अप द टिगरीस’ इराक पर वैश्विक प्रतिबंधों के मानवीय प्रभाव का सशक्त दस्तावेज़ है। उन्होंने अरब-अमेरिकी लेखकों के संगठन आरएडब्ल्यूआई की स्थापना में भी अग्रणी भूमिका निभाई।
एक विदेशी युवती, जो तिब्बती बच्चों की शिक्षिका बनकर आई थी, आगे चलकर हिमालयी अध्ययन और वैश्विक पत्रकारिता की जानी-मानी आवाज़ बन गई। सीखने और समझने की चाहत इंसान को दुनिया के किसी भी कोने से जोड़ सकती है। शिमला की पहाड़ियों में शुरू उनकी यात्रा यह प्रेरणा देती है। उनकी आधिकारिक वेबसाइट: https://barbaranimri.com/ पर उनके बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं।
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Jyoti maurya

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