अंतिम संस्कार से पहले देनदारियां चुकाईं, वेतन दिया और फिर राजा संग सती हो गई, कश्मीर की रानी रहीं कांगड़ा की वीरांगना सूर्यामती की प्रेरककथा

अंतिम संस्कार से पहले देनदारियां चुकाईं, वेतन दिया और फिर राजा संग सती हो गई, कश्मीर की रानी रहीं कांगड़ा की वीरांगना सूर्यामती की प्रेरककथा
अंतिम संस्कार से पहले देनदारियां चुकाईं, वेतन दिया और फिर राजा संग सती हो गई, कश्मीर की रानी रहीं कांगड़ा की वीरांगना सूर्यामती की प्रेरककथा
विनोद भावुक। कांगड़ा
कांगड़ा की धरती इतिहास में अमिट छाप छोड़ने वाली कई वीरांगनाओं की जन्मभूमि है। इन्हीं में से एक थीं कांगड़ा नरेश इन्दुचन्द्र की पुत्री सूर्यामती, जो 11वीं सदी के कश्मीर और लोहरा वंश के राजनीतिक उतार-चढ़ाव से जुड़ी। यह कहानी केवल सत्ता संघर्ष की नहीं, तप, त्याग, मातृत्व और आत्मसम्मान की है, जिसे ब्रिगेडियर रतन कौल ने अपनी पुस्तक ‘किंग्डम ऑफ कश्मीर’ में विस्तार से प्रस्तुत किया है।
सूर्यामती का जन्म कांगड़ा राजघराने में हुआ था। राजनीतिक परिस्थितियों के चलते सूर्यामती का विवाह कश्मीर के लोहरा वंश के राजा अनन्तदेव (1028–1063 ई.) से हुआ। ब्रिगेडियर रतन कौल लिखते हैं कि यह विवाह केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक गठबंधन भी था, क्योंकि उस समय गंधार और उत्तर-पश्चिम में ग़ज़नी के आक्रमणों से सत्ता संतुलन बदल रहा था।
रानी ने संभाला राजकोष, सदाशिव मंदिर का निर्माण
विदेशी व्यापारियों से ऋण, राजकोषीय अव्यवस्था और दरबारी षड्यंत्र के चलते राजा अनन्त आर्थिक संकटों में उलझ गए। कहा जाता है कि उन्होंने मोरपंख अंकित मुकुट तक गिरवी रख दिया। ऐसे समय में सूर्यामती ने प्रशासन की बागडोर संभाली। उन्होंने कश्मीर में झेलम के तट पर सदाशिव मंदिर का निर्माण कराया और राजकोष को व्यवस्थित किया।
राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कश्मीरी ब्राह्मण कवि सोमदेव ने रानी सूर्यमती को शांत रखने और मानसिक संतुलन के लिए हर रोज कथाएँ सुनानी शुरू कीं। इन्हीं कथाओं का संग्रह आगे चलकर संस्कृत का महान ग्रंथ ‘कथासरित्सागर’ बना, जो भारतीय लोककथाओं और दंतकथाओं का अमूल्य भंडार है। इन कथाओं ने सूर्यामती के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और आत्मस्वीकृति की नई परत जोड़ी।
राजा संग सती हुई रानी
राजा अनन्त ने आखिर अपने पुत्र कलश के पक्ष में गद्दी छोड़ दी, परंतु दरबारी षड्यंत्रों और कलश के दुर्व्यवहार ने परिवार में दरार डाल दी। राजा के विजयेश्वर (आज का बिजबेहड़ा क्षेत्र) में शरण लेने के बाद भी स्थिति बिगड़ती गई। 1081 ई. में उपजे एक विवाद के दौरान अनन्त ने क्रोध में कटु शब्द कहे और फिर आत्मघात कर लिया।
पति की मृत्यु से विचलित सूर्यामती ने अंतिम संस्कार से पहले सभी देनदारियां चुकाईं, अनुयायियों का वेतन दिया और पवित्र जल लेकर प्रतिज्ञा ली। उन्होंने अपने पौत्र हर्ष को आशीर्वाद दिया, नैतिक पवित्रता की शपथ ली और सती हो गईं। यह घटना इतिहास में एक करुण, किंतु दृढ़ नारी की मिसाल के रूप में दर्ज है, जो अपने निर्णयों और प्रभाव के परिणामों को स्वीकार करती है।
कश्मीर की रियासत, कांगड़ा की विरासत
सूर्यामती जैसी साहसी नारी की कथा हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक है। यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें कांगड़ा और कश्मीर के ऐतिहासिक संबंधों की झलक मिलती है। सूर्यमती नारी नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता का उदाहरण बनीं और ‘कथासरित्सागर’ की रचना के ऐतिहासिक संदर्भ का हिस्सा रहीं।
बेशक यह कथा मध्यकालीन राजनीति और पारिवारिक संघर्ष का दस्तावेज है, लेकिन महिला नेतृत्व की मिसाल भी है, जो कहती है कि इतिहास केवल राजाओं की शौर्यगाथा नहीं, रानियों की आत्मशक्ति का भी इतिहास है। कांगड़ा की यह बेटी कश्मीर की रानी बनी, प्रशासन संभाला, सांस्कृतिक धरोहर को जन्म दिया और अंततः तपस्या की प्रतिमूर्ति बनकर अमर हो गई।
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Jyoti maurya

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